अमेरिकी राजनीति में जेडी वेंस का धार्मिक दृष्टिकोण

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  पूनम शर्मा

अमेरिकी राजनीति एक बार फिर वैचारिक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस द्वारा अमेरिका को खुले तौर पर “ईसाई राष्ट्र” के रूप में परिभाषित करने की सोच ने न केवल डेमोक्रेटिक खेमे को, बल्कि रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी गहरी बहस को जन्म दिया है। यह बहस केवल धर्म और राजनीति के संबंध तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका की लोकतांत्रिक आत्मा, संवैधानिक मूल्यों और बहुलतावादी समाज की दिशा से भी जुड़ी हुई है।

अमेरिकी मूल्य

जेडी वेंस स्वयं को पारंपरिक अमेरिकी मूल्यों का समर्थक मानते हैं। उनका तर्क है कि अमेरिका की ऐतिहासिक पहचान ईसाई नैतिकता, परिवार-केंद्रित सामाजिक ढांचे और सांस्कृतिक अनुशासन से बनी है। वे मानते हैं कि आधुनिक उदारवाद, वैश्वीकरण और सांस्कृतिक बहुलता ने अमेरिका की “मूल आत्मा” को कमजोर किया है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पथ अमेरिका को एकजुट करेगा या और अधिक विभाजित करेगा? अमेरिका एक ऐसा राष्ट्र रहा है जिसकी नींव संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर टिकी है। यहां धर्म को निजी आस्था माना गया, न कि राज्य की पहचान। वेंस का दृष्टिकोण इस संतुलन को चुनौती देता है। आलोचकों का मानना है कि यदि राज्य स्वयं को किसी एक धर्म से जोड़ता है, तो अल्पसंख्यक समुदायों—चाहे वे धार्मिक हों, नस्लीय हों या वैचारिक—के लिए असुरक्षा की भावना बढ़ेगी।

रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी इस मुद्दे पर स्पष्ट विभाजन दिखता है। पार्टी का एक वर्ग वेंस को ऐसे नेता के रूप में देखता है जो खोए हुए श्वेत, ग्रामीण और धार्मिक मतदाताओं को फिर से संगठित कर सकता है। ये मतदाता मानते हैं कि आधुनिक अमेरिका में उनकी सांस्कृतिक पहचान को हाशिये पर धकेल दिया गया है। वेंस की भाषा उन्हें सम्मान और प्रतिनिधित्व का एहसास कराती है।

अमेरिका की बदलती जनसांख्यिकी

दूसरी ओर, पार्टी का उदार और व्यावहारिक धड़ा इस राह को खतरनाक मानता है। उनका तर्क है कि अमेरिका की बदलती जनसांख्यिकी—जिसमें नस्लीय विविधता, प्रवासी समुदाय और धार्मिक बहुलता शामिल है—के दौर में “ईसाई राष्ट्र” का नैरेटिव रिपब्लिकन पार्टी को सीमित दायरे में कैद कर देगा। इससे युवा मतदाता, शहरी वर्ग और स्वतंत्र सोच वाले नागरिक पार्टी से दूर हो सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके प्रभाव कम नहीं होंगे। अमेरिका लंबे समय से स्वयं को लोकतंत्र, मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के वैश्विक रक्षक के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। यदि उसकी शीर्ष नेतृत्व भाषा धार्मिक राष्ट्रवाद की ओर झुकती है, तो यह उसकी नैतिक विश्वसनीयता को कमजोर कर सकता है। मित्र राष्ट्रों के साथ संबंधों में असहजता और विरोधी शक्तियों को वैचारिक हथियार मिलने की आशंका भी जताई जा रही है।

ईसाई राष्ट्र

हालांकि, वेंस के समर्थक यह भी कहते हैं कि उनकी बातों को अतिरंजित रूप में पेश किया जा रहा है। उनके अनुसार, “ईसाई राष्ट्र” का अर्थ किसी पर धर्म थोपना नहीं, बल्कि नीति-निर्माण में नैतिकता, उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक निरंतरता को महत्व देना है। वे इसे पश्चिमी सभ्यता की रक्षा की लड़ाई के रूप में देखते हैं।

असल में, यह अमेरिकी राजनीति की उस गहरी बेचैनी को उजागर करता है, जो पहचान, आस्था और सत्ता के प्रश्नों से जुड़ी है। यह संघर्ष नया नहीं है, लेकिन आज यह कहीं अधिक तीखा और सार्वजनिक हो गया है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि जेडी वेंस की वैचारिक दिशा रिपब्लिकन पार्टी को नई ऊर्जा देती है या उसे सीमित और विभाजित कर देती है।

निष्कर्ष

वेंस का दृष्टिकोण केवल एक नेता की सोच नहीं, बल्कि उस अमेरिका की तस्वीर है जो अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच संतुलन खोजने की कोशिश कर रहा है। यही संतुलन तय करेगा कि.  यह विचार अमेरिका के लिए उत्थान का मार्ग बनेगा या राजनीतिक और सामाजिक टकराव का कारण।

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