‘स्वदेशी शक्ति ही आर्थिक स्वराज्य और स्थिरता का मार्ग’

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पूनम शर्मा
भारत की आत्मा केवल उसकी सीमाओं में नहीं, बल्कि उसकी उत्पादन क्षमता, श्रम संस्कृति और आत्मसम्मान में बसती है। यही कारण है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “आत्मनिर्भर भारत” का आह्वान करते हैं, तो वह महज एक सरकारी नारा नहीं होता, बल्कि राष्ट्र की चेतना को जगाने वाला एक मिशन बन जाता है।

डॉ. महाजन के अनुसार, आज भारत जिस वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा है, वहां केवल बाजार नहीं, बल्कि शक्तिसंतुलन भी तय होता है। यदि कोई देश अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी आयात पर निर्भर है, तो उसकी संप्रभुता कमजोर पड़ती है। यही कारण है कि स्वदेशी केवल आर्थिक विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मसम्मान का प्रश्न भी है।

आत्मनिर्भरता: भावनात्मक नहीं, व्यावहारिक आवश्यकता

अक्सर स्वदेशी को भावनात्मक मुद्दा मान लिया जाता है, आत्मनिर्भरता एक व्यावहारिक आर्थिक रणनीति है। जब देश के भीतर उत्पादन बढ़ता है, तो रोजगार सृजित होते हैं, स्थानीय उद्योग मजबूत होते हैं और पूंजी देश के भीतर ही घूमती रहती है। इसके विपरीत, विदेशी वस्तुओं पर अत्यधिक निर्भरता न केवल घरेलू उद्योगों को कमजोर करती है, बल्कि बेरोजगारी और आर्थिक असमानता को भी बढ़ाती है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में यदि उत्पादन का केंद्र देश के बाहर होगा, तो रोजगार का लाभ भी बाहर ही जाएगा। ऐसे में आत्मनिर्भर भारत केवल विकास का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का मॉडल भी बनता है।

प्रधानमंत्री मोदी का आह्वान: एक राष्ट्रीय संकल्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “वोकल फॉर लोकल” और “लोकल से ग्लोबल” जैसे अभियानों के माध्यम से स्वदेशी को जनआंदोलन का रूप दिया गया है। डॉ. महाजन मानते हैं कि यह पहल भारतीय अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। उन्होंने कहा कि यदि उपभोक्ता स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देना शुरू करें, तो बाजार स्वयं ही भारतीय उद्योगों के पक्ष में झुक जाएगा।

यह परिवर्तन किसी एक दिन में नहीं होगा, लेकिन यदि हर भारतीय यह संकल्प ले कि वह जहां संभव हो, भारतीय उत्पादों का ही उपयोग करेगा, तो इसका प्रभाव देश की जीडीपी, रोजगार और नवाचार—तीनों पर दिखाई देगा।

स्वदेशी बनाम वैश्वीकरण: टकराव नहीं, संतुलन

डॉ. अश्वनी महाजन यह स्पष्ट करते हैं कि स्वदेशी का अर्थ वैश्वीकरण का विरोध नहीं है। भारत को वैश्विक बाजारों से जुड़ना चाहिए, लेकिन अपनी शर्तों पर। आत्मनिर्भरता का मतलब यह नहीं कि भारत दुनिया से कट जाए, बल्कि यह कि भारत मजबूत आधार के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उतरे।

उन्होंने कहा कि जब देश का घरेलू उद्योग मजबूत होता है, तब ही वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिक सकता है। अन्यथा, भारत केवल उपभोक्ता बनकर रह जाएगा, निर्माता नहीं।

युवा और स्वदेशी आंदोलन

डॉ. महाजन विशेष रूप से युवाओं से अपील करते हैं कि वे स्टार्टअप, नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से स्वदेशी आंदोलन को नई ऊर्जा दें। आज भारत के युवा तकनीक, डिजाइन और मार्केटिंग में किसी से कम नहीं हैं। आवश्यकता है तो केवल विश्वास और समर्थन की।

यदि सरकारी नीतियां, वित्तीय संस्थान और उपभोक्ता—तीनों मिलकर स्वदेशी उद्यमों को बढ़ावा दें, तो भारत न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में भी उभरेगा।

आर्थिक स्वराज्य की ओर निर्णायक कदम

अंततः, डॉ. अश्वनी महाजन का संदेश स्पष्ट है—स्वदेशी केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की कुंजी है। आर्थिक स्वराज्य तभी संभव है जब भारत अपनी जरूरतों का समाधान स्वयं करे, अपने श्रमिकों को अवसर दे और अपनी पूंजी को देश में ही निवेश करे।

आज जब दुनिया आर्थिक अनिश्चितताओं, सप्लाई चेन संकट और भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रही है, तब भारत के लिए आत्मनिर्भरता कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है। स्वदेशी शक्ति ही वह मार्ग है, जो भारत को स्थिर, सशक्त और आत्मविश्वासी राष्ट्र बना सकता है।

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