पूनम शर्मा
क्या इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है?
बांग्लादेश एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहाँ से उसके सामने केवल दो रास्ते हैं—या तो लोकतंत्र की ओर वापसी, या फिर अराजकता और हिंसा के उस चक्र में फिसलना, जिसे वह पहले भी झेल चुका है। बीते कुछ हफ्तों में जो कुछ ढाका से लेकर सीमावर्ती इलाकों तक घटा है, वह किसी अचानक भड़की हिंसा का परिणाम नहीं है, बल्कि वर्षों से बोए गए राजनीतिक ज़हर और सुनियोजित अस्थिरता का नतीजा है।
यूनुस सरकार और सत्ता का संकट
शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद जो सरकार बनी, उसके केंद्र में मोहम्मद यूनुस हैं। शुरुआत में इसे “अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति प्राप्त विकल्प” के रूप में पेश किया गया, लेकिन आज वही सरकार अपने ही फैसलों और गठजोड़ों के बोझ तले दबती दिख रही है। यूनुस सरकार पर यह आरोप गहराता जा रहा है कि उसने कट्टरपंथी, जिहादी और भारत-विरोधी तत्वों को या तो खुली छूट दी या फिर उन्हें रोकने में जानबूझकर उदासीनता दिखाई।
सड़कों पर हिंसा, ऊपर आसमान में साजिश
बांग्लादेश की सड़कों पर जो खून बह रहा है, वह स्वतःस्फूर्त नहीं है। छात्र आंदोलनों की आड़ में जिस तरह चुनिंदा नेताओं, पुलिस अधिकारियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया, उससे यह साफ हो गया है कि यह हिंसा “नियंत्रित अराजकता” का हिस्सा है। एक जिहादी नेता की हत्या और उसके बाद उसके भाई द्वारा यूनुस सरकार पर सीधे आरोप लगाना, इस बात का संकेत है कि सत्ता के भीतर और बाहर दोनों तरफ अविश्वास की खाई चौड़ी हो चुकी है।
अर्थव्यवस्था की सच्चाई और भारत की केंद्रीय भूमिका
यूनुस सरकार के अपने वित्तीय सलाहकार सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके हैं कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भारत के सहयोग के बिना टिक नहीं सकती। यह स्वीकारोक्ति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक भी है। व्यापार, ट्रांजिट, ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति—हर स्तर पर बांग्लादेश भारत पर निर्भर है। भारत ने अब तक संयम बरता है, लेकिन उसने सीमा पर सुरक्षा बढ़ाकर और कूटनीतिक दबाव बनाकर यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि हिंदुओं पर हमले और भारत-विरोधी उन्माद को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जाएगा।
अमेरिका का बदला हुआ सुर
दिलचस्प मोड़ तब आया जब अमेरिका से ही यूनुस सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। अमेरिकी सांसदों द्वारा पत्र लिखकर चुनाव टालने पर सवाल उठाना, हिंदुओं पर हिंसा को लेकर बयान की तैयारी और बांग्लादेश की सत्ताधारी संरचना को “लोकतांत्रिक दायरे में लौटने” की चेतावनी—ये सब संकेत हैं कि यूनुस सरकार अब केवल भारत ही नहीं, अपने पश्चिमी संरक्षकों का भरोसा भी खोती जा रही है।
न्यायपालिका पर दबाव और लोकतंत्र का क्षरण
बांग्लादेश में अदालतों की भूमिका भी इस संकट में सवालों के घेरे में है। रिपोर्टें बताती हैं कि सरकारी वकीलों को फटकार लगाई जा रही है, जजों पर अप्रत्यक्ष दबाव डाला जा रहा है और यह अपेक्षा की जा रही है कि फैसले “सत्ता के अनुकूल” हों। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय टालना और चुनाव प्रक्रिया को कानूनी जटिलताओं में उलझाए रखना, इस आशंका को जन्म देता है कि लोकतंत्र को जानबूझकर स्थगित किया जा रहा है।
शेख हसीना की वापसी की आहट
इसी बीच बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई दे रहा है। शेख हसीना की आवाज़ एक बार फिर देश में गूंज रही है। उनकी पार्टी और खालिदा जिया की बीएनपी—जो कभी एक-दूसरे की कट्टर प्रतिद्वंद्वी थीं—अब जिहादी और पाकिस्तान-समर्थित ताकतों के खिलाफ एक साझा समझ बनाती दिख रही हैं। 14 राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव में हिस्सा लेने की घोषणा और फरवरी की तय तारीख पर जोर, यह दर्शाता है कि राजनीतिक धारा अब फिर से मुख्यधारा की ओर लौटना चाहती है।
डर का माहौल और सत्ता का अलगाव
सबसे बड़ा संकेत यह है कि जिन छात्र नेताओं और कट्टरपंथी समूहों को कल तक सत्ता का संरक्षण प्राप्त था, आज वे खुद सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं। पत्रकार, व्यापारी और आम नागरिक भय के साए में जी रहे हैं। हत्याएँ हो रही हैं, लेकिन दोषी पकड़े नहीं जा रहे—क्योंकि सत्ता तंत्र के भीतर ही दरारें पड़ चुकी हैं।
भारत का स्पष्ट संदेश
भारत ने अब यह साफ कर दिया है कि बांग्लादेश के साथ संबंध केवल व्यापार या कूटनीति तक सीमित नहीं रहेंगे। हिंदुओं पर हमले, अराजकता और भारत-विरोधी प्रदर्शनों को राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से देखा जाएगा। नमक, चावल, मसाले से लेकर ट्रांजिट और ऊर्जा तक—हर विकल्प भारत के पास है, और ढाका यह जानता है कि भारत के बिना उसका अंतरराष्ट्रीय संतुलन असंभव है।
निष्कर्ष: फैसला अब बांग्लादेश को करना है
बांग्लादेश के सामने अब बहाने खत्म हो चुके हैं। या तो वह समय पर चुनाव कराकर लोकतांत्रिक वैधता लौटाए, या फिर सत्ता की जिद में खुद को अंतरराष्ट्रीय अलगाव, आर्थिक संकट और आंतरिक विघटन की ओर धकेल दे। इतिहास गवाह है—जो सरकारें जनता से कट जाती हैं, वे अंततः सड़कों पर ही जवाब देती हैं। सवाल सिर्फ इतना है: क्या बांग्लादेश इस बार इतिहास से सीखेगा, या फिर उसे दोहराएगा?