आपसी सहमति से तलाक में एक साल अलग रहना जरूरी नहीं : हाईकोर्ट
कोर्ट ने कहा कि कानून को पति-पत्नी के आपसी निर्णय में दखल नहीं देना चाहिए, रुकावट से भविष्य प्रभावित हो सकता है
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हाई कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक में एक साल अलग रहने की कानूनी शर्त जरूरी नहीं।
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कोर्ट ने छह महीने की कूलिंग-ऑफ अवधि को भी माफ करने की संभावना जताई।
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निर्णय से पति-पत्नी को भविष्य में पुनर्विवाह और सामाजिक जुड़ाव के अवसर मिलेंगे।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी पवित्र है, लेकिन आपसी सहमति पर कानून हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली | 19 दिसंबर: दिल्ली हाई कोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक मामलों में एक साल अलग रहने की कानूनी शर्त को माफ करने का अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि सभी रिश्तों को सुधारा नहीं जा सकता और कानून को पति-पत्नी के आपसी निर्णय में बाधित नहीं करना चाहिए।
जस्टिस नवीन चावला, नूप जे भंभानी और रेनू भटनागर की बेंच ने कहा कि शादी एक पवित्र रिश्ता है, लेकिन जब पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक लेना चाहते हैं, तो कानून को उनके फैसले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि अनिच्छुक पार्टियों को शादी के दलदल में फंसाने की बजाय उनके निर्णय का सम्मान होना चाहिए।
हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत धारा 13B(2) की कूलिंग-ऑफ अवधि पर स्पष्ट किया। बेंच ने कहा कि अलग होने का एक साल पूरा किए बिना आपसी सहमति से तलाक के लिए याचिका दायर की जा सकती है और छह महीने की कूलिंग-ऑफ अवधि को भी कोर्ट विवेकाधिकार से माफ कर सकता है।
कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक में देरी किसी भी पक्ष को नए संबंध बनाने या भविष्य की संभावनाओं का अवसर लेने से रोक सकती है। निर्णय में यह भी कहा गया कि कानून का उद्देश्य शादी को मजबूर करना नहीं होना चाहिए, बल्कि पति-पत्नी की आजादी का सम्मान करना आवश्यक है।