पूनम शर्मा
भारतीय राजनीति इस समय एक दिलचस्प लेकिन निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। विपक्ष के भीतर सिर्फ भाजपा बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं चल रही, बल्कि विपक्ष के अंदर ही नेतृत्व को लेकर घमासान मचा हुआ है। चर्चा अब खुलकर होने लगी है कि कांग्रेस को दरकिनार कर एक थर्ड फ्रंट खड़ा किया जाए—ऐसा मोर्चा जिसमें न राहुल गांधी हों, न कांग्रेस का केंद्रीय दबदबा।
इसी संदर्भ में दो नाम सबसे ज़्यादा उछाले जा रहे हैं—अखिलेश यादव और ममता बनर्जी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस कथित थर्ड फ्रंट का चेहरा कौन होगा? कांग्रेस को बाहर करने की कोशिश क्यों? विपक्ष के कई दलों को अब यह साफ़ दिखने लगा है कि कांग्रेस के साथ रहने का मतलब है—
नेतृत्व पर राहुल गांधी का वर्चस्व
रणनीतिक अस्पष्टता
ज़मीनी चुनावी ताकत की कमी
इसलिए एक वैकल्पिक ढांचे की बात हो रही है, जिसमें कांग्रेस “सपोर्टिंग रोल” में रहे या पूरी तरह बाहर हो। लेकिन समस्या यह है कि कांग्रेस के बिना विपक्ष का राष्ट्रीय विस्तार अधूरा रहता है, और कांग्रेस के साथ रहने पर नेतृत्व का सवाल खड़ा हो जाता है। ममता को पीछे क्यों धकेला गया? एक समय था जब ममता बनर्जी को विपक्ष का सबसे मुखर चेहरा बताया जा रहा था। लेकिन हालिया घटनाक्रमों में उन्हें धीरे-धीरे बैकफुट पर धकेल दिया गया है।
इसके कई कारण हैं:
पश्चिम बंगाल में लगातार विवाद
महिला सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और बयानबाज़ी
SIR और वोटर लिस्ट संशोधन को लेकर बढ़ता दबाव
खुद ममता बनर्जी यह मान चुकी हैं कि लाखों नाम वोटर लिस्ट से हट सकते हैं, और यह सीधा-सीधा उनकी राजनीति पर असर डालता है। जब ज़मीन खिसकती है, तो नेतृत्व का दावा भी कमजोर पड़ता है।
अब अखिलेश को आगे क्यों किया जा रहा है? ऐसे में अखिलेश यादव को आगे लाने की चर्चा तेज़ हो गई है। उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी, यादव–मुस्लिम समीकरण और युवा चेहरा—ये सब अखिलेश की ताकत मानी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि— क्या अखिलेश राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व संभाल सकते हैं? क्या ममता उनके अधीन काम करेंगी? यहीं से टकराव शुरू होता है। राजनीति कोई सीधी रेखा नहीं होती। यह ठीक वैसी ही है जैसे किसी फिल्म में टाइमिंग और किरदारों का सही जगह आना ज़रूरी हो। अगर समय गलत हुआ, तो हीरो भी फ्लॉप हो जाता है। अखिलेश को आगे करना एक टेस्ट मूवमेंट है—देखा जा रहा है कि वह दबाव झेल पाते हैं या नहीं।
थर्ड फ्रंट की सबसे बड़ी समस्या:
नेतृत्व संघर्ष
थर्ड फ्रंट की असली कमजोरी यही है—कोई सर्वमान्य नेता नहीं। ममता खुद को पीछे मानने को तैयार नहीं। अखिलेश आगे आकर भी अकेले निर्णय नहीं ले सकते। कांग्रेस बाहर होकर भी अंदरूनी असर बनाए रखती है। ऐसे में यह मोर्चा बनने से पहले ही बिखरता दिख रहा है।SIR और घुसपैठ पर असली टकराव पूरा राजनीतिक खेल सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट की सफाई (SIR) और घुसपैठ के मुद्दे से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल और सीमावर्ती इलाकों में यह सबसे बड़ा डर है कि—
फर्जी वोटर हटेंगे
अवैध घुसपैठ उजागर होगी
राजनीतिक संतुलन बदल जाएगा
यही वजह है कि सबसे तीखा विरोध वहीं से आ रहा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि पड़ोसी देश भी इन लोगों को लेने से मना नहीं कर पाएंगे, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय दबाव और समझौते अपनी जगह हैं। भाजपा की रणनीति क्यों अलग दिखती है? मोदी और अमित शाह की राजनीति “रिएक्शन” पर नहीं, बल्कि सीक्वेंस और टाइमिंग पर चलती है।
पहले वोटर लिस्ट की सफाई,
फिर जनगणना,
फिर डिलिमिटेशन,
और फिर चुनाव।
इसी क्रमबद्धता ने विपक्ष को भ्रमित कर दिया है। विपक्ष अभी तक यह तय नहीं कर पाया कि उसे विरोध करना है या विकल्प गढ़ना है।
निष्कर्ष:
थर्ड फ्रंट से पहले ही फ्रैक्चर आज की स्थिति यह है कि: कांग्रेस को बाहर करने की कोशिश चल रही है ममता कमजोर पड़ रही हैं अखिलेश को आगे लाया जा रहा है, लेकिन भरोसा नहीं विपक्ष आपसी खींचतान में उलझा है ,जबकि दूसरी तरफ, देश में एक व्यवस्थित सफाई अभियान चल रहा है—वोटर लिस्ट से लेकर सिस्टम तक। आने वाला समय बताएगा कि थर्ड फ्रंट बनेगा या नहीं, लेकिन इतना साफ़ है कि जो राजनीति अव्यवस्था पर टिकी थी, वह अब दबाव में है। और जो राजनीति संरचना और सिस्टम पर काम कर रही है, वही आगे बढ़ती दिख रही है।