एस आई आर , सेन्सस ,डेलीमिटेशन : लोकतंत्र की सफाई विपक्ष की घबराहट

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पूनम शर्मा
आज भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि SIR (Special Intensive Revision), जनगणना और डिलिमिटेशन किसी एक समुदाय, राज्य या वर्ग के खिलाफ साजिश हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि यह पूरी प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र की संरचनात्मक मरम्मत से जुड़ी हुई है। सवाल सीधा और बुनियादी है—जब वोट गिने जाएँगे, तो क्या पहले यह तय नहीं होना चाहिए कि वोटर वास्तव में भारतीय नागरिक है या नहीं?

कोई भी गिनती तब तक ईमानदार नहीं हो सकती, जब तक सूची शुद्ध न हो। जैसे कोई डॉक्टर क्लिनिक शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित करता है कि दवाइयाँ असली हैं या नकली, उसी तरह वोटर लिस्ट की सफाई लोकतंत्र की पहली शर्त है। बिना सफाई के गिनती केवल आंकड़ों का छलावा बन जाती है।

पहले सफाई, फिर गिनती SIR का उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है—

डुप्लीकेट नाम हटाना

फर्जी दस्तावेज़ों से जुड़े वोटर निकालना

मृत, स्थानांतरित या अवैध रूप से जुड़े नाम हटाना

इसके बाद ही वास्तविक भारतीय मतदाताओं की संख्या सामने आती है। सरकार इसी तार्किक क्रम पर चल रही है—पहले SIR, फिर Census और उसके बाद Delimitation। विपक्ष की घबराहट की असली वजह भी यही है।

डिजिटल Census: कागज़ी खेल का अंत

भारत में जनगणना हर 10 साल में अनिवार्य है। पिछली Census 2011 में हुई थी, 2021 में कोविड के कारण टल गई। अब 2025 से जो Census शुरू होगी, वह आज़ाद भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल, रियल-टाइम जनगणना होगी।

लगभग 30 लाख प्रशिक्षित अधिकारी, हर Enumerator को डिजिटल आईडी, GPS टैगिंग, लाइव डेटा एंट्री—यानी न फॉर्म गुम होंगे, न फर्जी एंट्री की गुंजाइश रहेगी। यह बदलाव सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि सत्ता की पारदर्शिता का संकेत है। जम्मू-कश्मीर का पूर्ण समावेश -पहली बार जम्मू-कश्मीर पूरी तरह राष्ट्रीय Census का हिस्सा बनेगा। पहले अलग व्यवस्थाएँ थीं, अब “एक भारत–एक प्रणाली” लागू होगी। यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीक भी है—और यही बात कई दलों को असहज कर रही है।

Census क्यों ज़रूरी है?

क्योंकि सरकार की हर नीति इसी डेटा पर टिकी होती है—

कितने गरीब हैं?

कितने पात्र लाभार्थी हैं?

कहाँ स्कूल चाहिए, कहाँ अस्पताल?

महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का वास्तविक अनुपात क्या है?

आज नीतियाँ 2011 के पुराने डेटा पर बन रही हैं। नया सटीक डेटा आएगा, तो फर्जी लाभार्थी बाहर होंगे और असली हकदार अंदर। यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति असहज हो जाती है।

Delimitation: असली राजनीतिक भूकंप

Delimitation यानी संसदीय सीटों का पुनर्वितरण—जहाँ जनसंख्या ज़्यादा, वहाँ प्रतिनिधित्व ज़्यादा। आज स्थिति यह है कि दिल्ली के चांदनी चौक जैसे क्षेत्रों में करोड़ों लोग हैं, जबकि कुछ इलाकों में कुछ लाख—लेकिन सांसदों की संख्या बराबर। यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।

इसीलिए नया संसद भवन 840 से अधिक सांसदों की क्षमता के साथ बनाया गया है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि 2029 के बाद की नई राजनीतिक संरचना का संकेत है। विपक्ष को डर किस बात का है? हकीकत यह है कि— कई राज्यों में 10–15 मिलियन वोटर SIR में हट सकते हैं । बंगाल, बिहार, असम जैसे राज्यों में इसका सीधा असर पड़ेगा खुद ममता बनर्जी यह स्वीकार कर चुकी हैं कि “डेढ़ करोड़ नाम हट सकते हैं” यानी डर काल्पनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक गणित से पैदा हुआ डर है।

महिला आरक्षण और जाति जनगणना का विरोधाभास

महिला आरक्षण कानून पास हो चुका है, लेकिन Delimitation के बिना लागू नहीं हो सकता। यही कारण है कि जो दल महिला आरक्षण का समर्थन करते दिखते हैं, वही Delimitation से पीछे हटते हैं।

इसी तरह जाति जनगणना की माँग  करने वाला विपक्ष अब खुद असहज है। दशकों तक मुस्लिम समाज को एक “वोट बैंक” के रूप में पेश किया गया, अंदरूनी सामाजिक विभाजन पर पर्दा डाला गया, जबकि हिंदू समाज को दर्जनों जातियों में बाँट दिया गया। नया डेटा इस संतुलन को बदल सकता है—और यही डर है।

थर्ड फ्रंट की राजनीति और नेतृत्व संकट

इसी पृष्ठभूमि में थर्ड फ्रंट की चर्चा तेज़ हुई है—कांग्रेस को किनारे कर अखिलेश या ममता को आगे लाने की कोशिश। लेकिन समस्या साफ़ है— कोई सर्वमान्य नेता नहीं ,ममता पीछे हटने को तैयार नहीं ,अखिलेश राष्ट्रीय नेतृत्व के दबाव की परीक्षा में हैं ,कांग्रेस बाहर होकर भी प्रभाव बनाए रखती हैयानी थर्ड फ्रंट बनने से पहले ही टूटता दिख रहा है।

भाजपा की रणनीति: शोर नहीं, क्रम

मोदी और अमित शाह की राजनीति रिएक्शन पर नहीं, बल्कि सीक्वेंस और टाइमिंग पर चलती है— पहले वोटर लिस्ट की सफाई, फिर जनगणना,
फिर डिलिमिटेशन, और फिर चुनाव। विपक्ष इसी क्रमबद्धता को समझ नहीं पा रहा है।

निष्कर्ष: यह चुनाव नहीं, सिस्टम रीसेट है

यह पूरा घटनाक्रम केवल Census या SIR नहीं, बल्कि लोकतंत्र का री-इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट है। इसीलिए शोर है। इसीलिए भ्रम है। इसीलिए घबराहट है।लेकिन सच यही है— पहले सफाई होगी, फिर गिनती होगी, और फिर चुनाव होगा। बाकी सब राजनीति है।

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