भारत :आंतरिक सुरक्षा का विस्तार (CCTNS)
“इंटिग्रेटेड सिक्योरिटी सिस्टम से देशभर में क्राइम ट्रैकिंग होगी तेज”
पूनम शर्मा
भारत में आंतरिक सुरक्षा को लेकर आज जो गंभीरता दिखाई दे रही है, वह केवल आतंकवाद या संगठित अपराध का दबाव नहीं है, बल्कि एक ऐसे देश की आवश्यकताओं का परिणाम भी है, जो तेजी से डिजिटल हो रहा है और जहां अपराधों की प्रकृति लगातार बदल रही है। पिछले एक दशक में सुरक्षा तंत्र जिस दिशा में आगे बढ़ा है—विशेष रूप से CCTNS, ICJS, और NATGRID जैसे प्लेटफॉर्म्स—वह दिखाता है कि भारत अब खंडित, धीमी और कागज़ आधारित पुलिसिंग मॉडल से निकलकर रियल-टाइम इंटेलिजेंस और डेटा-इंटीग्रेशन के युग में प्रवेश कर चुका है।
1. 26/11 के बाद सुरक्षा ढांचे में बड़ा बदलाव
2008 के मुंबई हमलों ने इस कठोर सच्चाई को उजागर किया कि केंद्र और राज्यों के बीच सूचना का प्रवाह धीमा, अनियमित और तकनीकी रूप से पिछड़ा हुआ था।
इसी के बाद Crime and Criminal Tracking Network & Systems (CCTNS) का विचार आया—एक ऐसा नेटवर्क जहां देश के लगभग 15,000 पुलिस स्टेशन और बड़ी सुरक्षा व जांच संस्थाएं आपस में सूचनाएँ साझा कर सकें।
CCTNS का उद्देश्य था:
FIR और केस-डेटा का डिजिटल रिकॉर्ड
किसी भी संदिग्ध के खिलाफ किसी भी राज्य में दर्ज रिपोर्टों तक पहुँच
अपराध के पैटर्न, ट्रेवल ट्रेल्स, फाइनेंशियल लिंक्स की तेजी से पहचान
राज्य सीमाओं से परे अपराधियों की निगरानी
यानी यदि किसी शहर में कोई अपराधी पकड़ा जाए और उसके पुराने रिकॉर्ड खोजने हों, तो अब 30 दिन नहीं—30 सेकंड लगते हैं।
2. NATGRID – आधुनिक डेटा-इंटीग्रेशन का ढांचा
NATGRID को अक्सर गलत समझा जाता है। इसका उद्देश्य जनता से “नई जानकारी लेना” नहीं है।
बल्कि—
यह उन डेटा-सोर्सेज़ को जोड़ता है जो पहले से ही सरकार के पास विधिक रूप से मौजूद हैं।
इनमें शामिल हो सकते हैं:
ट्रैवल रिकॉर्ड ,बैंकिंग/लेनदेन ट्रेल, टैक्स-संबंधी बेसिक डेटा, अपराध या संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े ट्रेस, इसका मकसद आम लोगों पर नजर रखना नहीं, बल्कि संगठित अपराध, ड्रग्स, आतंकी नेटवर्क, और बड़े वित्तीय घोटालों से जुड़ी कड़ियों को तेजी से जोड़ना है। पहले जो काम महीनों में होता था, अब कुछ घंटों में हो सकता है।
3. क्यों बढ़ रही है डेटा- रिक्वेस्ट की संख्या?
जैसे-जैसे राज्यों में तकनीक-आधारित पुलिसिंग बढ़ी है, वैसे-वैसे अधिकृत अधिकारियों द्वारा डेटा-सहायता के अनुरोध भी बढ़े हैं।
यह दो कारणों से:
ज्यादा अपराध डिजिटल ट्रेल छोड़ते हैं—फोन, ट्रांज़ैक्शन, ट्रैवल।
जांच अधिकारी अब तकनीकी रूप से प्रशिक्षित होते जा रहे हैं, इसलिए उन्हें पता है कि किस डेटा के जरिए जांच तेजी से आगे बढ़ सकती है।
यह वही परिवर्तन है, जो दुनिया की हर आधुनिक पुलिस प्रणाली में होता है—जैसे-जैसे सिस्टम सक्षम होता है, उसकी डिमांड बढ़ती है।
4. यह सिस्टम “सर्विलांस” नहीं बल्कि “इंटीग्रेटेड इन्वेस्टिगेशन” है
कई लोग मान लेते हैं कि ऐसे डेटाबेस का मतलब “सरकार सब पर नजर रख रही है”—पर वास्तविकता यह है:
हर डेटा-एक्सेस के लिए बहु-स्तरीय अनुमति जरूरी है
केवल अधिकृत अधिकारी ही सीमित जानकारी देख सकते हैं
व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा के लिए कठोर प्रोटोकॉल हैं
यह सोशल मीडिया ऐप की तरह खुला प्लेटफॉर्म नहीं है
यानी यह किसी भी तरह से एक “ओपन डेटा एक्सेस सिस्टम” नहीं—बल्कि अत्यधिक नियंत्रित, सुरक्षित और उद्देश्य-विशिष्ट तंत्र है।
5. अपराध-जांच कैसे तेज होती है? एक उदाहरण
मान लीजिए किसी शहर में एक बड़ी चोरी होती है।
पुराना मॉडल:
FIR दर्ज
पड़ोसी राज्यों को चिट्ठियाँ
रिकॉर्ड आने में कई दिन
अपराधी तब तक दूसरे राज्य में ग़ायब
नया मॉडल:
संदिग्ध की पहचान होते ही अधिकारी CCTNS या ICJS पर तुरंत चेक करते हैं
ट्रैवल या खर्च का संदेह हो तो NATGRID पर अनुरोध
Pattern matching → पिछले रिकॉर्ड, यात्राएँ, गैंग कनेक्शन
एक ही दिन में संदिग्ध की गतिविधियों का प्रारंभिक खाका मिल जाता है
यह डिजिटल इंटीग्रेशन अपराधियों के लिए “राज्य सीमा” को बेकार बना देता है।
6. क्यों जरूरी है यह नया ढांचा?
अपराध अब मोबाइल है, राज्य सीमाओं से बंधा नहीं
नक्सल, ड्रग्स, ह्यूमन-ट्रैफिकिंग नेटवर्क बहु-राज्यीय हो चुके
आर्थिक अपराधों में डिजिटल फूटप्रिंट महत्वपूर्ण हो गया
कोर्ट, पुलिस, जांच एजेंसियों के बीच तेजी से डेटा प्रवाह जरूरी
आज के समय में अपराधी अक्सर:
एक राज्य में अपराध
दूसरे में रहना
तीसरे राज्य से पैसा भेजना
और चौथे राज्य से भागना
ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत डेटाबेस ही समाधान है।
7. आगे क्या?—AI, फेस रिकग्निशन, ट्रैवल सेक्टर इंटीग्रेशन
भविष्य में यह सिस्टम एयरपोर्ट, रेलवे, मेट्रो और बॉर्डर-चेकपॉइंट्स के साथ और ज़्यादा एकीकृत होगा—ताकि:
लंबे समय से फरार अपराधियों को तुरंत पकड़ा जा सके
बुजुर्ग/लापता व्यक्तियों के ट्रेस को तेज किया जा सके
ड्रग्स/हथियार नेटवर्क की मूवमेंट का पता चल सके
शुरुआत पहले ही हो चुकी है—कुछ मेट्रो और एयरपोर्ट्स में डिजिटल ट्रैकिंग की पायलट प्रोजेक्ट्स लागू हैं।
निष्कर्ष
भारत का आंतरिक सुरक्षा ढांचा अब “फिजिकल पुलिसिंग” से आगे बढ़कर डेटा-ड्रिवन, इंटीग्रेटेड और रियल-टाइम मॉडल की दिशा में तेजी से विकसित हो रहा है।
CCTNS, ICJS और NATGRID जैसे प्लेटफॉर्म केवल तकनीक नहीं—बल्कि पुलिसिंग के भविष्य का आधार हैं।
इनका लक्ष्य साफ है: तेज, पारदर्शी, वैज्ञानिक जाँच —और एक सुरक्षित भारत।