वीरता की कोई जाति नहीं, फिर अखिलेश का अहीर गौरव फोकस क्यों?
रेजांगला के शहीदों को ‘अहीर गौरव’ से जोड़ने पर नई बहस—क्या राष्ट्रीय नायकों की पहचान जाति से तय होनी चाहिए या यह वोटबैंक राजनीति का नया अध्याय है?
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अखिलेश यादव ने फिल्म स्क्रीनिंग में अहीर सैनिकों की विशेष भूमिका पर जोर दिया
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अहीर संगठनों ने ‘120 बहादुर’ पर ऐतिहासिक विकृति का आरोप लगाया
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जाति-आधारित रेजिमेंट की मांग फिर तेज, सेना को राजनीतिक विवाद में खींचने के आरोप
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सवाल—क्या उपेक्षित समुदायों को हक दिलाने का यह तरीका सही है या सामाजिक विभाजन बढ़ाएगा?
समग्र समाचार सेवा
लखनऊ, 27 नवम्बर: भारत में जाति जितनी गहराई से सामाजिक संरचना को प्रभावित करती है, उतनी ही तीव्रता से राजनीति को भी दिशा देती है। चुनावी मैदान से लेकर जनसामान्य के विमर्श तक, जाति अक्सर राजनीतिक संदेशों की धुरी बन जाती है। लेकिन जब यह जाति राष्ट्रीय सैन्य इतिहास या वीरता की गाथाओं पर लागू होने लगती है, तो बहस तीखी हो जाती है।
फरहान अख्तर अभिनीत फिल्म ‘120 बहादुर’ की लखनऊ में स्क्रीनिंग के दौरान समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रेजांगला युद्ध में अहीर समुदाय के सैनिकों की भूमिका की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि 1962 के उस निर्णायक मोर्चे पर लड़ने वाले अधिकांश सैनिक अहीर थे और उनकी वीरता को पहचान मिलनी चाहिए। इस टिप्पणी ने फिल्म के इर्द-गिर्द चल रहे विवाद को नया मोड़ दे दिया।
1962 के भारत–चीन युद्ध में लद्दाख के रेजांगला दर्रे पर 13 कुमाऊं रेजिमेंट के 120 जवानों ने करीब 3000 चीनी सैनिकों का सामना किया था। बर्फीला मौसम, सीमित संसाधन और भारी संख्या शक्ति के बावजूद भारतीय सैनिकों ने अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी। 114 सैनिक शहीद हुए, लेकिन उन्होंने चीन की सेना को असाधारण क्षति पहुंचाई। इनमें से अधिकांश सैनिक हरियाणा के रेवाड़ी–महेंद्रगढ़–गुड़गांव क्षेत्र से थे और अहीर समुदाय से आते थे।
फिल्म के सामने आते ही अहीर संगठनों ने आरोप लगाया कि इसमें समुदाय की पहचान को पर्याप्त रूप से नहीं दिखाया गया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने पर आपत्ति जताई। वहीं अखिलेश के बयान को भाजपा समर्थकों ने जाति आधारित राजनीति को सेना तक ले जाने का प्रयास बताया।
क्या वीरता को जाति से जोड़ना सही है?
यह प्रश्न सबसे बुनियादी है। राष्ट्र के सैनिक पहले भारतीय होते हैं, बाद में किसी जाति या समुदाय के। वीरता को जाति के आधार पर बांटना राष्ट्रीय गौरव को संकीर्ण बनाता है। क्या हम भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस या अशोक महान को उनकी जाति के आधार पर देखते हैं? नहीं—क्योंकि राष्ट्रीय नायक संपूर्ण राष्ट्र की धरोहर होते हैं। रेजांगला के शहीदों को ‘अहीर वीर’ कहना सम्मान जैसा लगता है, लेकिन यह उनकी भारतीय पहचान को सीमित भी करता है।
क्या जाति-आधारित रेजिमेंट की मांग तर्कसंगत है?
अखिलेश यादव 2019 से अहीर रेजिमेंट की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यह रेजांगला के शहीदों के सम्मान का माध्यम होगा। लेकिन सेना की संरचना ‘ऑपरेशनल जरूरत’ पर आधारित होती है, न कि जातीय पहचान पर। ब्रिटिश काल की ‘मार्शल रेस थ्योरी’ को भारत ने बहुत पहले नकार दिया था। अगर जाति-रेजिमेंट की शुरुआत होती है, तो अन्य समुदाय भी ऐसी ही मांगें उठाएंगे—जो सेना की एकता व तटस्थता को प्रभावित कर सकती हैं।
क्या राजनीति का सेना में प्रवेश खतरनाक है?
यादव समुदाय उत्तर प्रदेश और हरियाणा में समाजवादी पार्टी का अहम वोट बैंक है। रेजांगला की गाथा इस समुदाय में गहराई से जुड़ी भावनात्मक कहानी है। ऐसे में अखिलेश का बयान सिर्फ इतिहास-गौरव नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। भाजपा का आरोप है कि वे सेना की तटस्थ छवि को जातिगत राजनीति में घसीट रहे हैं।
क्या यह उपेक्षित समुदायों के अधिकार का सही रास्ता है?
भारत में दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों को लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया। ऐसे समुदायों को इतिहास में उचित स्थान दिलाना जरूरी है। लेकिन राष्ट्रीय नायकों को जाति के दायरे में बांटना समाज को और अधिक खंडित कर सकता है। पहचान देना ज़रूरी है, लेकिन वह पहचान राष्ट्रीय एकता को कमजोर किए बिना दी जानी चाहिए।