हलाल मीट परोसने को लेकर रेलवे को NHRC का नोटिस

आयोग ने कहा- यह प्रथा मानवाधिकारों का उल्लंघन, दो हफ्ते में कार्रवाई रिपोर्ट मांगी

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  • भेदभाव का आरोप: NHRC ने रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को नोटिस जारी कर हलाल मीट की नीति पर रिपोर्ट मांगी है।
  • आजीविका पर असर: आयोग ने कहा कि केवल हलाल मांस परोसने से हिंदू अनुसूचित जाति समुदायों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • संवैधानिक उल्लंघन: शिकायत में दावा किया गया है कि यह प्रथा हिंदू और सिख यात्रियों के धार्मिक एवं भोजन चुनने के अधिकारों का उल्लंघन है।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 26 नवंबर: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भारतीय रेलवे और उसकी सहयोगी कंपनी IRCTC की खानपान सेवाओं में कथित रूप से केवल ‘हलाल-प्रमाणित’ मांस परोसे जाने की शिकायत पर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने इस संबंध में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत ‘कार्रवाई रिपोर्ट’ (Action Taken Report – ATR) जमा करने का निर्देश दिया है। NHRC ने इस प्रथा को प्रथम दृष्टया मानवाधिकारों का उल्लंघन माना है।

मानवाधिकारों का उल्लंघन क्यों?

भोपाल के सुनील अहिरवार द्वारा दायर एक शिकायत पर संज्ञान लेते हुए, NHRC की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को रेखांकित किया। आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया मानवाधिकारों का उल्लंघन प्रतीत होते हैं।

आयोग ने अपने नोटिस में दो मुख्य चिंताएं जताई हैं:

1. धार्मिक और खाद्य विकल्पों का हनन

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि भारतीय रेलवे की इस नीति के कारण हिंदू और सिख यात्रियों को उनके धार्मिक विश्वासों के अनुरूप भोजन के विकल्प नहीं मिलते। कई हिंदू और सिख समुदाय पारंपरिक रूप से ‘झटका’ (Jhatka) तरीके से काटे गए मांस को वरीयता देते हैं, जबकि रेलवे के मेन्यू में केवल हलाल प्रमाणित मांस ही उपलब्ध होने का आरोप है। आयोग ने जोर दिया कि रेलवे एक सरकारी एजेंसी है और उसे भारत के संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के अनुरूप सभी धार्मिक आस्थाओं के लोगों के भोजन चुनने के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।

2. दलित समुदायों की आजीविका पर प्रभाव

NHRC ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि केवल हलाल मांस परोसने की प्रथा से उन अनुसूचित जाति (Scheduled Caste – SC) के हिंदू समुदायों और अन्य गैर-मुस्लिम समुदायों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जो परंपरागत रूप से मांस व्यापार से जुड़े हुए हैं। शिकायत के अनुसार, हलाल मीट की अनिवार्यता इन समुदायों को रेलवे की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला और व्यापार के उचित अवसर से वंचित करती है, जिससे उनके पेशा चुनने की स्वतंत्रता (संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g)) और समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन होता है।

रेलवे की ओर से मांगा गया स्पष्टीकरण

NHRC ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के तहत संज्ञान लेते हुए रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष को विस्तृत जांच करने का निर्देश दिया है। दो सप्ताह की समय सीमा यह सुनिश्चित करती है कि यह एक संवेदनशील और प्राथमिकता वाला मामला है, जिस पर सरकार को जल्द से जल्द स्पष्टीकरण देना होगा।

यह मुद्दा पिछले कई वर्षों से सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि, इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन (IRCTC) ने अतीत में यह स्पष्टीकरण दिया था कि उनके लिए ‘हलाल सर्टिफिकेशन’ अनिवार्य नहीं है, लेकिन शिकायतकर्ताओं का दावा है कि व्यावहारिक रूप से अधिकांश आपूर्तिकर्ता (सप्लायर) हलाल प्रमाणित ही होते हैं।

इस नोटिस के बाद, रेलवे बोर्ड को अब यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी कैटरिंग नीति क्या है और वह कैसे देश के सभी समुदायों के यात्रियों के हितों और आजीविका के अधिकारों के बीच संतुलन सुनिश्चित करेगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारतीय रेलवे इस विवादित मुद्दे पर क्या कार्रवाई रिपोर्ट पेश करता है।

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