SIR पर विपक्ष की बढ़ी चिंता, सपा–कांग्रेस ने बनाई काउंटर प्लानिंग
PDA वोटरों के नाम कटने की आशंका, अखिलेश ने उतारे ‘PDA प्रहरी’, कांग्रेस भी गांव-गांव सक्रिय
-
बिहार में SIR के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटने के बाद यूपी में विपक्ष और सतर्क
-
सपा-कांग्रेस को आशंका—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोटरों के लाखों नाम छँट सकते हैं
-
यूपी में 4 नवंबर से जारी सर्वे में अब तक 69% फॉर्म बंट चुके; कई जिलों में बड़े पैमाने पर डुप्लीकेट वोट मिले
-
बीजेपी और चुनाव आयोग का दावा—यह नियमित अपडेट, फर्जी वोटर हटाने की सामान्य प्रक्रिया
समग्र समाचार सेवा
लखनऊ, 19 नवंबर: 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची की गहन समीक्षा का काम शुरू हो चुका है। यह वही प्रक्रिया है जिसे बिहार में Special Intensive Revision (SIR) के नाम से चलाया गया था। बिहार में इस अभियान के दौरान मतदाता सूची से लाखों नाम हटाए गए थे, जिसके बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था। अब वही मॉडल यूपी सहित कई राज्यों में लागू होने लगा है, जिससे प्रदेश में राजनीतिक गर्मी बढ़ गई है।
बिहार का अनुभव और यूपी की चिंता
बिहार में SIR के तहत मृत, दोहरी पहचान वाले और गलत दस्तावेज पर बने लगभग 65 से 68 लाख नाम हटे थे। उस समय विपक्ष ने इसे PDA—यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय—को निशाना बनाने का आरोप बताया था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा, लेकिन प्रक्रिया बीच में नहीं रुकी।
अब जब यूपी में SIR शुरू हुआ है, सपा और कांग्रेस को लगता है कि बिहार में जो हुआ, वही परिस्थितियाँ यहां भी दोहराई जा सकती हैं। दोनों पार्टियों की आशंका है कि भाजपा मजबूत क्षेत्रों में तो नाम कम कटेंगे, जबकि PDA बहुल इलाकों में भारी कटौती दिख सकती है। इसी डर ने उन्हें पहले से ज्यादा सक्रिय कर दिया है।
UP में SIR की ताज़ा स्थिति
- 4 नवंबर से घर-घर जाकर SIR फॉर्म भरवाए जा रहे हैं।
- अब तक लगभग 69% फॉर्म लोगों तक पहुँचे
- कई जिलों में यह संख्या 80–90% तक
- पीलीभीत, बिजनौर, वाराणसी, हापुड़ सहित कई इलाकों में हजारों–लाखों दोहरे नाम पकड़े गए
- अनुमान है कि पूरे प्रदेश में 30–50 लाख नाम हट सकते हैं
चूंकि प्रक्रिया तेजी से चल रही है, इसी कारण विपक्षी पार्टियाँ हर ब्लॉक और हर बूथ पर अपने लोग तैनात कर रही हैं।
सपा-कांग्रेस की रणनीति: PDA प्रहरी से लेकर लोकल वॉच तक
अखिलेश यादव ने हर विधानसभा क्षेत्र में “PDA प्रहरी” नियुक्त किए हैं, जिनका काम बीएलओ की टीम के साथ रहना, फॉर्म की जांच करना और यह देखना है कि किसी वैध वोटर का नाम गलती से न कट जाए। सपा का कहना है कि बिहार की घटनाओं से सबक लेते हुए वे यूपी में पूरा माइक्रो-मैनेजमेंट कर रहे हैं।
कांग्रेस भी इस प्रक्रिया में गांव-गांव जाकर लोगों की मदद कर रही है। उनका आरोप है कि कई गरीब परिवारों, प्रवासी मजदूरों और अल्पसंख्यक समुदाय के पास पासपोर्ट, पुराने प्रमाणपत्र या जन्म-तिथि का रिकॉर्ड नहीं होता। ऐसे में उनका वैध नाम भी कट सकता है।
विपक्ष का बड़ा आरोप—पैटर्न समझ में आ रहा है
विपक्ष का कहना है कि जहां विपक्षी या अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में ज्यादा कटौती सामने आ रही है, वहीं भाजपा समर्थक क्षेत्रों में नाम अपेक्षाकृत कम हटाते दिख रहे हैं। सपा ने यह भी कहा कि कई जगहों पर बीएलओ की नियुक्ति में भी पक्षपात दिख रहा है, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
बीजेपी और चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया
बीजेपी और चुनाव आयोग दोनों ने आरोपों को नकार दिया है। उनका कहना है कि भारत में हर कुछ सालों बाद मतदाता सूची का रिवीजन होता है और SIR उसी का हिस्सा है।
उनका तर्क है,
- इससे फर्जी वोटिंग रुकती है
- दोहरी पहचान वाले वोटर हटाए जाते हैं
- प्रक्रिया पूरी तरह समान है, किसी धर्म या जाति के लिए अलग नहीं
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने खुद SIR फॉर्म भरकर जनता को भी ऐसा करने की अपील की है।
जिम्मेदारी का खेल जारी
एक ओर सरकार इसे नियमित प्रशासनिक काम बता रही है, दूसरी ओर विपक्ष इसे चुनावी रणनीति में हस्तक्षेप कह रहा है। यूपी में चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर यह विवाद किस दिशा में जाएगा, यह आने वाले महीनों में साफ होगा—लेकिन फिलहाल SIR ने राजनीति को गरमा दिया है।