क्लाउड सीडिंग पर सवाल: करोड़ों पानी में, लेकिन दिल्ली की जहरीली हवा जस की तस!
डॉक्टरों की चेतावनी – अब बच्चों के फेफड़े भी हो रहे काले, विशेषज्ञ बोले – “बारिश नहीं, नीति चाहिए”
-
बिना बादल और नमी के ही किया गया क्लाउड सीडिंग का महंगा प्रयोग
-
वैज्ञानिकों ने पहले ही चेताया था, सफलता की संभावना लगभग शून्य
-
असर सिर्फ दो-ढाई दिन का, लागत करोड़ों में
-
डॉक्टरों का दावा, अब बच्चों के फेफड़े भी कोयले जैसे काले
-
विशेषज्ञों की राय, अस्थायी राहत नहीं, दीर्घकालिक नीति ज़रूरी
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली | 11 नवंबर: दिल्ली की हवा इन दिनों मौत बन चुकी है। हर सांस के साथ प्रदूषण फेफड़ों के अंदर उतर रहा है। उम्मीद थी कि क्लाउड सीडिंग यानी कृत्रिम बारिश से इस जहरीले धुएं को धोया जा सकेगा, लेकिन यह प्रयोग न तो मौसम के हिसाब से सही साबित हुआ और न ही परिणाम दे पाया।
मौसम वैज्ञानिकों ने पहले ही आगाह कर दिया था कि दिल्ली के आसमान में न तो बादल हैं, न नमी। इसके बावजूद भारी खर्च पर यह प्रयोग किया गया।
गलत समय पर किया गया प्रयोग– विशेषज्ञों की राय
क्लाइमेट ट्रेंड्स की जलवायु विशेषज्ञ मंजरी शर्मा ने कहा कि यह पूरा प्रयास “वैज्ञानिक दृष्टि से गलत समय पर किया गया” था।
भारत मौसम विभाग (IMD) ने IIT दिल्ली को पहले ही सूचित किया था कि वायुमंडल में नमी 20% से भी कम है, जबकि क्लाउड सीडिंग की सफलता के लिए कम से कम 60-70% नमी जरूरी होती है।
महंगा प्रयोग, असर कुछ घंटों का
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर क्लाउड सीडिंग से बारिश हो भी जाती, तो उसका असर 48 घंटे से ज्यादा नहीं रहता।
इस प्रक्रिया को बार-बार करना पड़ेगा, और हर बार करोड़ों रुपये खर्च होंगे।
अनुमान है कि अगर सर्दियों भर इसे जारी रखा जाए, तो कुल लागत 25 से 30 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगी।
डॉक्टरों की चेतावनी – अब बच्चों के फेफड़े भी काले
गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल के फेफड़ा विशेषज्ञ डॉ. अरविंद कुमार ने बताया कि पिछले तीन दशकों में उन्होंने मरीजों के फेफड़ों में भयावह बदलाव देखा है।
उन्होंने कहा, “पहले मरीजों के फेफड़े हल्के गुलाबी होते थे। अब वही फेफड़े काले हो चुके हैं धूल, कालिख और जहरीले कणों से भरे हुए।
डॉ. कुमार ने यह भी बताया कि पहले यह स्थिति सिर्फ धूम्रपान करने वालों या फैक्ट्री मजदूरों में देखी जाती थी, लेकिन अब बच्चों और महिलाओं के फेफड़े भी उसी हालत में हैं।
दिल्ली की हवा – अब जानलेवा खतरा
हालिया रिपोर्ट बताती है कि वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों ने अब मौतों का प्रमुख कारण बनना शुरू कर दिया है।
36% मौतें स्ट्रोक से
33% फेफड़ों के कैंसर से
31% हृदय रोगों से
20% फेफड़ों की पुरानी बीमारियों (COPD) से
विशेषज्ञों के मुताबिक, अब यह ज़हर सिर्फ सांस की तकलीफ तक सीमित नहीं, बल्कि दिल, दिमाग, किडनी और नसों पर भी असर डाल रहा है।
बारिश नहीं, नीति चाहिए – मंजरी शर्मा
मंजरी शर्मा ने कहा, क्लाउड सीडिंग या सड़कों पर पानी छिड़कना अस्थायी उपाय हैं। असली ज़रूरत साफ हवा के लिए ठोस नीति की है। लोगों को अब सरकार से ‘क्लीन एयर’ की मांग करनी चाहिए, न कि कृत्रिम बारिश की।
उन्होंने यहां तक कहा कि अगर संभव हो, तो दिल्ली की जहरीली हवा से दूर जाना ही फिलहाल सबसे सुरक्षित विकल्प है।