तेजेन्द्र शर्मा
सवाल यह उठता है कि आख़िर अमेरिका के संविधान में ऐसा क्या है, जिसके कारण ‘शट डाउन’ इतनी आसानी से लगाया जा सकता है? यदि पाकिस्तान जैसे देश की सरकार के पास अपने कर्मचारियों को पगार देने के पैसे नहीं हैं, तो समझ में आता है; मगर विश्व के सबसे अमीर और शक्तिशाली देश की हालत ऐसी पतली हो, तो सवाल उठना तो लाज़मी है।
“मैं अमेरिका को फिर से महान बना दूंगा!” … “भारत पर 50% टैरिफ़ लागू कर रहा हूँ!” … “भारत और रूस की अर्थव्यवस्था मृतप्राय है!” … “रूस-यूक्रेन युद्ध असल में नरेन्द्र मोदी युद्ध है!” … “मैंने आठ महीने में आठ युद्ध-विराम करवाए!” … “मुझे कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं देंगे!” … – ये सब बोलने के बाद डॉनल्ड ट्रंप ने पहली अक्टूबर को अमेरिका में ‘शट-डाउन’ की घोषणा कर दी। यानि कि अब अमेरिका के सरकारी कर्मचारियों को ज़बरदस्ती छुट्टी पर जाना होगा, या फिर उन्हें बिना पगार के काम करना होगा।
ध्यान देने योग्य बात है कि अमेरिका के महान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी 35 दिन लंबा ‘शट-डाउन’ हुआ था, जो अब तक का सबसे लंबा ‘शट डाउन’ माना जाता है। दरअसल, अमेरिका में ‘शट-डाउन’ कोई नई स्थिति नहीं है। इससे पहले भी कई राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में यह कई बार हो चुका है। रिकॉर्ड के अनुसार, राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के शासनकाल में 8 बार, जिमी कार्टर के दौरान 5 बार, बिल क्लिंटन के समय 2 बार, बराक ओबामा के दौर में 1 बार और जेराल्ड फ़ोर्ड के समय 1 बार शट-डाउन हुआ था।
सवाल यह उठता है कि आख़िर अमेरिका के संविधान में ऐसा क्या है, जिसके कारण ‘शट डाउन’ इतनी आसानी से लगाया जा सकता है? यदि पाकिस्तान जैसे देश की सरकार के पास अपने कर्मचारियों को पगार देने के पैसे नहीं हैं, तो समझ में आता है; मगर विश्व के सबसे अमीर और शक्तिशाली देश की हालत ऐसी पतली हो, तो सवाल उठना तो लाज़मी है।
अमेरिका में सरकारी ‘शट-डाउन’ तब होता है, जब वार्षिक व्यय विधेयकों पर सहमति नहीं बन पाती है। अमेरिकी सरकार के अलग-अलग विभागों को चलाने के लिए भारी मात्रा में फ़ंड की जरूरत होती है। इसके लिए संसद (कांग्रेस) से बजट या ‘फंडिंग बिल’ पारित कराना जरूरी होता है। लेकिन, जब राजनीतिक मतभेद या गतिरोध की वजह से ‘फंडिंग बिल’ पारित नहीं हो पाता, तो सरकार के पास कानूनी रूप से खर्च करने के लिए फंड नहीं बचता। ऐसी स्थिति में अमेरिकी सरकार को अपनी गैर-जरूरी सेवाएँ बंद करनी पड़ती हैं, जिसे ‘सरकारी शट-डाउन’ कहा जाता है।
राष्ट्रपति ट्रंप और विपक्षी डेमोक्रैटिक पार्टी में स्वास्थ्य सुरक्षा और कमजोर समूहों के लाभों की रक्षा को लेकर असहमति है, और दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े हैं। यह मुद्दा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मूल राजनीतिक विषय का प्रतिनिधित्व करता है। ट्रंप की पार्टी को सीनेट में अस्थायी ‘फंडिंग बिल’ पास कराने के लिए कम से कम 60 वोटों की जरूरत थी, लेकिन सिर्फ 55 वोट ही जुट पाए। ऐसे में यह प्रस्ताव गिर गया है, जो डॉनल्ड ट्रंप के लिए असहज स्थिति है। ट्रंप की समस्या यह है कि वे एक ही समय पर बहुत से मोर्चों पर लड़ाई कर रहे हैं। उनकी टैरिफ़ नीति ने वैसे ही अमेरिकी जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ा रखा है।
इस बार के ‘शट-डाउन’ का खतरा और गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि ट्रंप इसकी आड़ में लाखों कर्मचारियों की छंटनी और कई अहम योजनाओं को बंद करने की तैयारी कर सकते हैं। ‘शट डाउन’ से ठीक पहले उन्होंने इसके संकेत भी दे दिए हैं। ट्रंप अमेरिका की समस्याओं का हल नहीं हैं। सच तो यह है कि वर्तमान में डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका की सबसे बड़ी समस्या हैं। और यदि ग़ौर से देखा जाए, तो वे इस समय पूरे विश्व के लिए एक समस्या बने हुए हैं।
ज़ाहिर है कि यह ज्वलंत प्रश्न उठेगा ही कि इस ‘शट-डाउन’ के दौरान क्या-क्या घटित हो सकता है। सबसे पहले तो कुल सरकारी कर्मचारियों में से 40 फीसदी यानी लगभग 8 लाख कर्मियों को बिना वेतन लंबी छुट्टी पर भेजा जा सकता है।
हेल्थ और ह्यूमन सर्विस विभाग ने अपने 41 प्रतिशत कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजने की तैयारी की है। आशंका यह भी है कि कई सरकारी दफ़्तर बंद हो जाएंगे, साथ ही नेशनल पार्क, म्यूज़ियम और कई सरकारी वेबसाइटें भी काम करना बंद कर सकती हैं।
करीब 8 लाख फेडरल कर्मचारियों को बिना वेतन के अनिवार्य छुट्टी पर भेजा जा सकता है, जिसे ‘फ़र्लों’ कहा जाता है। कानून व्यवस्था, सीमा सुरक्षा, मेडिकल और हवाई और रेल आदि जरूरी सेवाएँ जारी रहेंगी। ‘शट-डाउन’ का असर ट्रांसपोर्ट सेवाओं पर दिखेगा, उड़ानों में देरी संभव है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ‘शट डाउन’ जितना लंबा चलेगा, उसके दुष्प्रभाव उतने ही ज्यादा होंगे। ‘शट-डाउन’ लंबा चला, तो बाज़ारों पर असर दिख सकता है और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
अमेरिकी सरकार के ‘शट-डाउन’ के परिणामस्वरूप कई संघीय सेवाओं पर असर पड़ना शुरू हो गया है। इसका प्रभाव भारत स्थित अमेरिकी दूतावास पर भी दिखाई दिया, जब उसने घोषणा की कि ‘शटडाउन’ के कारण उसका ‘X’ पर आधिकारिक अकाउंट नियमित रूप से अपडेट नहीं किया जाएगा। दूतावास ने कहा कि विनियोजन में चूक के चलते अकाउंट पर केवल अत्यावश्यक सुरक्षा और संरक्षा संबंधी जानकारियाँ ही साझा की जाएंगी, जबकि नियमित अपडेट संचालन दोबारा शुरू होने तक निलंबित रहेंगे।
भारत में भी इस विषय पर सोच-विचार अवश्य चल रहा होगा। बहुत से लोग यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि इस प्रकार के ‘शट-डाउन’ से भारतवासियों एवं भारतवंशियों को क्या नुकसान हो सकते हैं। सबसे पहले तो परेशानी होने वाली है- भारतीय छात्रों एवं ‘एच1-बी’ वीज़ा के तहत अमेरिका जाने वाले भारतीय पेशेवरों को। अमेरिका के श्रम विभाग के कर्मचारियों को तो छुट्टी पर भेजा जा चुका है। इसलिए वीज़ा और रोज़गार में तो देरी होना स्वाभाविक है।
भारत की आई.टी. कंपनियों पर काम का दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि अमेरिकी कंपनियाँ अपना काम भारतीय कंपनियों को आउटसोर्स कर सकती हैं। और यह भी स्पष्ट है कि जब केवल अति-आवश्यक सेवाओं से ही काम चल रहा होगा, तो व्यापारिक लाइसेंस, अनुमति पत्र आदि मिलने में भी समय लगेगा। इसका असर भारतीय व्यापारियों पर अवश्य पड़ेगा, जो अमेरिका में व्यापार करना चाहते हैं। ‘ई-प्रणाली’ तो लगभग ठप्प ही हो जाएगी।
अमेरिका में काम कर रहे भारतीय मूल के लोगों को भी उसी तरह पगार मिलने में देरी होगी, जैसे कि अन्य अमेरिकी लोगों को। उनकी वित्तीय स्थिति पर असर पड़ेगा, अतः प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाली विदेशी मुद्रा में भी कमी आएगी ही। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर अवश्य पड़ेगा।
अमेरिका में पर्यटन पर विपरीत असर पड़ने की पूरी संभावना है। कई नागरिक सेवाएँ निलंबित या प्रभावित हुई हैं। राष्ट्रीय उद्यान, संग्रहालय और स्मारक बंद हो गए हैं, जिससे पर्यटन और पर्यावरण सुरक्षा पर असर पड़ेगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही अनुभवी हों, लेकिन अपने ज़िद्दी स्वभाव के चलते वे कांग्रेस से भिड़ गए और आर्थिक बिल 55-45 मतों से पास नहीं हो सका। अनुमान है कि यदि यह ‘शटडाउन’ एक महीने तक चलता है, तो अमेरिका को हर सप्ताह लगभग 15 अरब डॉलर का नुकसान होगा। करीब 45 हज़ार लोग बेरोज़गार हो सकते हैं। शेयर बाज़ार में आई गिरावट न केवल अमेरिका बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित कर सकती है। ऐसी स्थिति आम जनता में भय और असमंजस पैदा कर रही है।
शेयर बाज़ार में मंदी आने पर निवेशकों को न केवल आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि उनका भरोसा भी डगमगा सकता है।
जितना लंबा यह ‘शट-डाउन’ चलेगा, अर्थव्यवस्था के लिए संभलना उतना ही कठिन होता जाएगा। अमेरिका के परिवहन विभाग ने पुष्टि की है कि एअर ट्रैफिक कंट्रोल और विमानन से जुड़े कई कर्मचारी बिना वेतन काम कर रहे हैं, जबकि ग्यारह हज़ार से अधिक कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजा गया है। अमेरिकी एयरलाइंस ने भी चेतावनी दी है कि इस राजनीतिक गतिरोध का खामियाजा यात्रियों और विमानन उद्योग- दोनों को उठाना पड़ सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप का मौजूदा कार्यकाल शुरू से ही विवादों में घिरा रहा है। उन्होंने नैटो सदस्य देशों के नेताओं से बातचीत उस अंदाज़ में की जैसे कोई स्कूल का प्रिंसिपल अपने स्टाफ़ या छात्रों से करता हो। यूक्रेन के राष्ट्रपति को कैमरे के सामने अपमानित कर दिया। उन्होंने टैरिफ़ ऐसे लगाना शुरू किया मानो यह रोज़ सुबह शेयर बाज़ार के भाव बताने की प्रक्रिया हो। यदि हालात नहीं सुधरे तो ट्रंप का सत्ता में बने रहना मुश्किल हो सकता है। संभव है कि पर्दे के पीछे कुछ हलचल पहले ही शुरू हो चुकी हो। अमेरिका की स्थिति बिगड़ती है तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा|
साभार: द पुरवाई