देशभक्ति और देवभक्ति अलग नहीं: डॉ. मोहन भागवत

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  • डॉ. मोहन भागवत ने देवभक्ति और देशभक्ति को एक ही बताया।
  • उन्होंने शिवजी को भारत की एकता का प्रतीक और ज्ञान का आदिगुरु बताया।
  • सरसंघचालक ने कहा कि दुनिया को अब भारत के ‘अपनेपन’ के रिश्ते से रास्ता मिलेगा।


कुमार राकेश
नागपुर, 11 सितम्बर – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने एक विशेष आध्यात्मिक और सामाजिक कार्यक्रम में देवभक्ति और देशभक्ति के बीच के गहरे संबंध को उजागर किया। उन्होंने नागपुर के मानकापुर क्रीड़ा स्टेडियम में आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग महारुद्र पूजा के अवसर पर संबोधित करते हुए कहा कि ये दोनों शब्द भले ही अलग दिखते हों, लेकिन हमारे देश की संस्कृति में ये एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस कार्यक्रम में आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर भी मंच पर उपस्थित थे।

देवभक्ति ही सच्ची देशभक्ति है: सरसंघचालक का संदेश

अपने संबोधन में डॉ. भागवत ने कहा, “जो व्यक्ति वास्तविक देवभक्ति करता है, वह देश की भी भक्ति अवश्य करेगा। और जो प्रामाणिकता से देशभक्ति करेगा, भगवान उससे देवभक्ति भी करवा लेंगे।” उन्होंने इस बात को तर्क नहीं, बल्कि अनुभव का विषय बताया। डॉ. भागवत ने कहा कि भारत का इतिहास तब से है जब इतिहास भी नहीं जागा था। उन्होंने शिवजी को आदिगुरु बताते हुए कहा कि वे सबके अंदर एक तत्व को जानने के 108 रास्ते सिखाते हैं। मनुष्यों की प्रकृति अलग-अलग होती है, इसलिए हर किसी को एक ही रास्ता पसंद नहीं आता, लेकिन सभी को अंततः एक ही जगह पहुंचना है, और इन अनेक मार्गों के उद्गाता भगवान शिव ही हैं।

भारतीय संस्कृति में ‘अपनापन’ और ‘तपस्या’ का महत्व

सरसंघचालक ने तपस्या के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह केवल भारत में ही है। जब तपस्या के सार को व्यक्ति पा लेता है, तो वह यह जान जाता है कि “जो मुझ में है, वही सब में है और जो सब में है, वही मुझ में है।” यह ज्ञान आपसी संबंधों को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि हमारा रिश्ता आपसी ‘अपनापन’ पर आधारित है, न कि किसी कॉन्ट्रैक्ट पर। हम बच्चों को इसलिए नहीं पढ़ाते कि वे बड़े होकर हमारी सेवा करें, बल्कि इसलिए क्योंकि वे हमारे अपने हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि आज की दुनिया में लोग ‘अपनेपन’ के इस रिश्ते को तरस रहे हैं, क्योंकि पिछले दो हजार वर्षों से दुनिया जिस प्रभाव में चली है, वह अधूरी बात पर आधारित है। उन्होंने कहा कि “जो बलवान है, वह जिएगा और जो दुर्बल है वह मरेगा,” इसी सोच के साथ दुनिया चल रही है। उन्होंने कहा कि मनुष्यों ने ज्ञान और विकास में बहुत प्रगति की है, लेकिन इसके बावजूद झगड़े और असंतोष खत्म नहीं हुए हैं। सुख-सुविधाएं तो बहुत बढ़ गईं, लेकिन संतोष नहीं है। इस तरह की अस्थिरता और पर्यावरण का खराब होना देखकर दुनिया अब सही रास्ता ढूंढ रही है, और यह रास्ता शिवजी के पास है, जो ‘अपनापन’ और ‘एकता’ का है।

श्री श्री रविशंकर ने किया अभिनंदन

कार्यक्रम में आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर ने डॉ. मोहन भागवत का अभिनंदन किया। उन्होंने पुष्पमाला, शाल और नंदीबैल की एक प्रतिकृति भेंट कर उनका सम्मान किया। श्री श्री रविशंकर ने डॉ. भागवत की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे कर्मनिष्ठ और समर्पित व्यक्ति हैं, जो लगातार अपना समय देश और समाज के लिए दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि भागवत जी के मार्गदर्शन से करोड़ों लोग देशभक्ति और धर्म की स्थापना में लगे हुए हैं।

श्री श्री रविशंकर ने संघ के प्रयासों की भी सराहना की और कहा कि यह पिछले 100 सालों से देश की धरोहर को बचाने का काम कर रहा है और इसमें यशस्वी भी हुआ है। उन्होंने युवाओं से प्रेरित होकर देश और देवभक्ति के कार्यों में लगने का आह्वान किया। यह कार्यक्रम दोनों महान आध्यात्मिक और सामाजिक हस्तियों के बीच आपसी सम्मान और एक साझा उद्देश्य को दर्शाता है, जिसका लक्ष्य भारत के प्राचीन मूल्यों के आधार पर एक मजबूत और एकजुट समाज का निर्माण करना है।

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