पूनम शर्मा
भारत के ऊर्जा नक्शे पर अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह अब सिर्फ पर्यटन या रणनीतिक सैन्य चौकियों तक सीमित नहीं रहा। यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में दक्षिण–पूर्व एशिया (आसियान) के लिए भारत की ऊर्जा कूटनीति का सबसे बड़ा दाँव साबित हो सकता है। सरकार ने हाल ही में इस द्वीपसमूह के गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज को तेज किया है, और विशेषज्ञों का मानना है कि ये भंडार भारत को न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर ले जाएंगे बल्कि आसियान देशों के लिए ऊर्जा आपूर्ति का नया जीवनरेखा भी बन सकते हैं।
अंडमान का ‘अनछुआ सोना’
तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) ने एक बार फिर उन क्षेत्रों में ड्रिलिंग शुरू की है जिन्हें दशकों तक नजरअंदाज किया गया। 1980 में ‘इन्द्रास्त्र’ मिशन और बाद में 2016 की ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी (OALP) ने इस दिशा में नींव रखी थी। इसी से जुड़े ब्लॉकों में शुरुआती परीक्षणों में जबर्दस्त संभावना दिखी थी—जैसे कि पोर्ट ब्लेयर संरचना से 1980 में ही 1.8 लाख क्यूबिक मीटर प्रतिदिन गैस निकली थी।
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री के मुताबिक, अंडमान सागर में 1,84,440 करोड़ लीटर तक कच्चे तेल की संभावना है। यह अनुमान सही साबित हुआ तो भारत की 80 प्रतिशत तेल और 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस आयात निर्भरता पर निर्णायक चोट लगेगी। मंत्री ने यह भी सवाल उठाया कि इतने महत्वपूर्ण संसाधनों की खोज को दशकों तक क्यों रोका गया।
आसियान की ऊर्जा भूख और भारत का मौका
कोविड महामारी के बाद आसियान देशों की ऊर्जा माँग ने अप्रत्याशित छलाँग लगाई। 2022 में यहां ऊर्जा खपत 15.2 प्रतिशत बढ़कर महामारी–पूर्व स्तर से भी ऊपर चली गई। खासकर कोयले की खपत में 80 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई। लेकिन बढ़ते प्रदूषण और वैश्विक दबावों ने इन्हें साफ ईंधन की ओर मोड़ना शुरू कर दिया है।
2023 तक अधिकांश आसियान देशों को प्राकृतिक गैस का आयात करना पड़ा। थाईलैंड ने म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया और कतर से अरबों डॉलर की गैस खरीदी। वियतनाम ने चीन, इंडोनेशिया और ब्रुनेई से एलएनजी आयात किया। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2027 तक आसियान पूर्ण रूप से प्राकृतिक गैस का शुद्ध आयातक बन जाएगा।
यहीं पर भारत के पास सुनहरा अवसर है। यदि अंडमान के संभावित तेल–गैस भंडार उत्पादन में बदलते हैं तो इन्हें कैंपबेल बे जैसे एलएनजी हब से सीधे दक्षिण–पूर्व एशिया पहुंचाया जा सकता है। यह भारत को आसियान के ऊर्जा संकट का समाधानकर्ता बना देगा।
ऊर्जा से बनेगा ‘एक्ट ईस्ट’ का पुल
भारत पहले ही म्यांमार और बांग्लादेश के जरिए पूर्वोत्तर में गैस पाइपलाइन परियोजनाओं पर काम कर रहा है। यदि इन्हें अंडमान के भंडार और म्यांमार के श्वे गैस सिस्टम से जोड़ा गया तो भारत न केवल घरेलू खपत पूरी कर पाएगा बल्कि आसियान देशों को भी एलएनजी आपूर्ति कर सकेगा।
2013 की ईआरआईए (ERIA) रिपोर्ट ने साफ कहा था कि भारत म्यांमार के जरिए आसियान पावर ग्रिड और ट्रांस–आसियान गैस पाइपलाइन से जुड़ सकता है। यही रणनीति अब भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ को ऊर्जा कूटनीति का मजबूत आधार देती है।
चीन पर संतुलन, आसियान में प्रभाव
म्यांमार की ऊर्जा परियोजनाओं पर चीन का वर्चस्व लंबे समय से भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। यदि भारत अंडमान–म्यांमार संसाधनों का समुचित उपयोग करता है, तो वह न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा बल्कि दक्षिण–पूर्व एशिया में चीन के प्रभाव को भी संतुलित कर सकेगा। ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता भारत को कूटनीतिक बढ़त दिलाएगी और उसे आसियान देशों का विश्वसनीय साझेदार बनाएगी।
भविष्य की तस्वीर
विश्लेषकों के अनुसार 2035 तक दक्षिण–पूर्व एशिया की ऊर्जा माँग में 35 प्रतिशत वृद्धि होगी और 2050 तक यह तिगुनी हो जाएगी। भारत स्वयं दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता बनने की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में अंडमान बेसिन के तेल–गैस भंडार सिर्फ घरेलू ऊर्जा सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि एक क्षेत्रीय रणनीतिक हथियार भी हैं।
अगर भारत इन भंडारों का दोहन करता है और आधुनिक एलएनजी इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करता है, तो वह ‘एनर्जी ब्रिज’ के रूप में आसियान तक पहुंच सकता है। इससे भारत की विदेश नीति को नई धार मिलेगी और दक्षिण–पूर्व एशिया में उसकी भूमिका एक आपूर्तिकर्ता ही नहीं, बल्कि स्थिरता प्रदाता के रूप में देखी जाएगी।
निष्कर्ष
अंडमान के गहरे समुद्र में छिपे ये काले सोने के भंडार केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि भारत की भू–रणनीति का भविष्य हैं। जिस प्रकार तेल ने खाड़ी देशों को वैश्विक शक्ति बनाया, उसी तरह भारत भी अंडमान को आसियान से जोड़कर अपनी ऊर्जा कूटनीति को नई ऊंचाई दे सकता है। सवाल अब सिर्फ इतना है कि क्या भारत समय रहते इस अवसर का लाभ उठाएगा और ऊर्जा सुरक्षा को क्षेत्रीय नेतृत्व में बदल पाएगा?