बदलते भारत-अमेरिका रिश्तों में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और अवसर

तनावों के बावजूद रणनीतिक सहयोग

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पूनम शर्मा
भारत-अमेरिका संबंधों की बदलती तस्वीर एक बार फिर वैश्विक चर्चा में है। रक्षा, अंतरिक्ष, वायरलेस तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग जारी है, भले ही व्यापार और नीतिगत दृष्टिकोण में कुछ मतभेद सामने आ रहे हों। दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्रों के बीच यह स्वाभाविक है। इन उतार-चढ़ावों के बावजूद, सहयोग की नींव मजबूत है — और भारतीय अर्थव्यवस्था कमज़ोर होने के बजाय, और भी लचीली और दूरदर्शी होती जा रही है।

साझेदारियों के साथ रक्षा में आत्मनिर्भरता

रक्षा क्षेत्र में भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि एफ-35 फाइटर जेट या “स्ट्राइकर” जैसे कुछ हाई-प्रोफाइल अमेरिकी प्रोजेक्ट हमारी तत्काल प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं हैं। यह सहयोग से इनकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकताओं और आत्मनिर्भरता लक्ष्यों के अनुसार रणनीतिक चयन है। नौसेना के लिए विस्तारित सी-295 विमान परियोजना, स्वदेशी कार्बाइन उत्पादन की रफ्तार और घरेलू रक्षा निर्माताओं की बढ़ती संख्या, एक आत्मविश्वासी औद्योगिक ढांचे का संकेत है।

संतुलित व्यापार रियायतें

व्यापार वार्ताएं असहमति का एक अधिक सार्वजनिक क्षेत्र हैं। मौजूदा अमेरिकी प्रशासन ने “पहले दबाव” की नीति अपनाई है, वहीं भारत सोच-समझकर कदम बढ़ा रहा है। कृषि क्षेत्र में दी गई रियायतें — जैसे कुछ फलों, बेरी और एथनॉल का निर्यात — इस तरह चुनी गई हैं कि घरेलू उत्पादकों को कम से कम असर हो।

शुल्क खतरों का सीमित असर

भले ही व्यापार तनाव बढ़ रहा हो और अमेरिका की ओर से शुल्क वृद्धि की आशंका हो, हकीकत यह है कि भारतीय निर्यात के कई अहम क्षेत्रों पर इसका असर बहुत सीमित है। उदाहरण के लिए, चमड़े के 95% निर्यात अब तक शुल्क की मार से बचे हुए हैं।

‘एक्ट ईस्ट’ और बाज़ार विविधीकरण

अगर स्थिति अक्टूबर के बाद दिसंबर तक बढ़ी, तो भारत जवाबी कदम उठा सकता है। लेकिन यही कारण है कि भारत लगातार बाज़ार विविधीकरण कर रहा है, घरेलू वैल्यू-चेन मजबूत बना रहा है और आसियान, फिलीपींस व अन्य ग्लोबल साउथ देशों में अपनी पकड़ बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति अब पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।

तकनीकी संप्रभुता की रणनीतिक आवश्यकता

तकनीकी मोर्चे पर भारत समझता है कि असली संप्रभुता के लिए इंजन, सेमीकंडक्टर और एयरोस्पेस सिस्टम पर महारत जरूरी है। फ्रांस की डसॉल्ट और सफ्रान जैसी कंपनियों का अनुभव एक अच्छा उदाहरण है। भारत के सीएसआईआर और नेशनल एयरोस्पेस प्रयोगशालाओं को भी वैश्विक मानकों पर खरा उतरना होगा, और इसमें निजी-सरकारी भागीदारी महत्वपूर्ण होगी।

त्योहारी सीजन से खपत में उछाल

आने वाला त्योहारी सीजन भी उम्मीद जगाता है। आंतरिक खपत हमेशा से भारत की आर्थिक स्थिरता की रीढ़ रही है, और जीएसटी, बैंकिंग और सप्लाई चेन सुधारों के साथ सरकार इसे और मजबूत कर सकती है।

नौकरशाही की बाधाएँ  हटाना जरूरी

इस क्षमता का पूरा लाभ उठाने के लिए नौकरशाही अवरोधों को दूर करना होगा। राजनीतिक नेतृत्व सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन कुछ हिस्सों में जड़ जमाए समाजवादी सोच अक्सर क्रियान्वयन को धीमा कर देती है।

ग्लोबल साउथ में भारत की मजबूत आवाज़

ग्लोबल साउथ में भारत की आवाज़ अब और मजबूत हो रही है। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में, विकासशील देशों की चिंताओं को सामने रखने और सस्ते, प्रभावी समाधान देने में भारत का कोई मुकाबला नहीं।

निष्कर्ष: चुनौती में अवसर

वर्तमान भारत-अमेरिका व्यापार तनाव कोई अस्तित्वगत संकट नहीं, बल्कि एक ‘स्ट्रेस टेस्ट’ है — जिसे भारत सफलतापूर्वक पार करने की स्थिति में है। रणनीतिक विविधीकरण, तकनीकी आत्मनिर्भरता और मजबूत घरेलू खपत के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था इस दौर में आत्मविश्वास से आगे बढ़ रही है।

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