क्या है यह SIR और क्यों हो रहा है?
1 अगस्त, 2025 को, भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) ने बिहार के विधानसभा चुनाव के लिए ड्राफ्ट मतदाता सूची, विशेष गहन संशोधन (SIR) पूरी होने के बाद जारी की । बिहार की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 65 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए। पटना में ही 3.55 लाख मतदाता गायब हैं, इसके बाद पूर्वी चंपारण, मधुबनी और गोपालगंज का स्थान है। लगभग 35 लाख लोग स्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं या अज्ञात हैं, 22 लाख लोगों की मृत्यु हो चुकी है, और 7 लाख लोग एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत थे (कोई व्यक्ति दो जगहों पर मतदाता नहीं हो सकता)। इसके अलावा, 1.22 लाख मतदाताओं ने फॉर्म जमा ही नहीं किए। ड्राफ्ट मतदाता सूची के प्रकाशन के साथ ही “दावे और आपत्तियों” का चरण शुरू हो गया है, जो 1 सितंबर, 2025 तक चलेगा। इस दौरान, जिनके नाम गलती से हट गए हैं, वे संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर सुधार करा सकते हैं।
बिहार में इस साल अक्टूबर-नवंबर के आसपास विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ECI एक नई मतदाता सूची तैयार कर रहा है, जिसमें मतदाताओं को गणना फॉर्म भरने और अपनी नागरिकता का दस्तावेजी सबूत देने की आवश्यकता है। पहले चरण में, निर्वाचन आयोग ने 7.89 करोड़ मतदाताओं को जो 24 जून, 2025 को मतदाता सूची में थे, पहले से भरे गए गणना फॉर्म प्रस्तुत किए । ECI के 24 जून के निर्देश के अनुसार, 2003 की मतदाता सूची में शामिल न होने वाले मतदाताओं को अपनी नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज जमा करने होंगे। दिसंबर 2004 के बाद जन्मे लोगों को अपने माता-पिता दोनों के नागरिकता दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होंगे।
25 जून से 26 जुलाई, 2025 के बीच, राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त बूथ-स्तरीय अधिकारी (BLO) ने, मतदाताओं को गणना फॉर्म वितरित किए और उनके द्वारा भरे गए फॉर्म के साथ पहचान और नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज एकत्र किए। मतदाताओं को फॉर्म ऑनलाइन डाउनलोड करने और जमा करने का विकल्प भी था। इस प्रक्रिया की देखरेख 243 निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO) और लगभग 3,000 सहायक ईआरओ ने की। 1.6 लाख से अधिक बूथ-स्तरीय एजेंट और अन्य कार्यकर्ताओं ने इस डेटा-संग्रह कार्य में भाग लिया। मतदाता आधिकारिक वेबसाइट पर अपनी स्थिति की जाँच कर सकते हैं। यह आश्वासन दिया गया कि जिन मतदाताओं को उनके पते पर नहीं पाया गया, BLOs द्वारा उनका पुन: सत्यापन किया जाएगा, और उनकी जानकारी राजनीतिक दलों के अध्यक्षों के साथ साझा की जाएगी। ECI ने कहा कि इस अभ्यास में सभी 243 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों और 90,817 मतदान केंद्रों को शामिल किया गया और इसे राजनीतिक दलों के साथ साझा किया गया।
विपक्ष की आलोचना और सुप्रीम कोर्ट का रुख
बिहार SIR की विपक्षी दलों ने आलोचना की है, और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दायर की गईं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “हम भारत निर्वाचन आयोग के कार्य में हस्तक्षेप करने के लिए अनिच्छुक हैं।” 10 जुलाई को, सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सुझावों के साथ SIR को जारी रखने की अनुमति दी और कहा, “यह मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है। यह हमारे लोकतंत्र की जड़ों से जुड़ा है। यह मतदान के अधिकार के बारे में है” – जस्टिस धूलिया ने टिप्पणी की। ECI ने विपक्षी दलों के मतदाता सूची में धोखाधड़ी के आरोपों को निराधार बताया। संसद के मानसून सत्र को विपक्षी दलों के विरोध के कारण कई दिन स्थगित करना पड़ा। लोकसभा में विपक्ष के नेता ने ECI को धमकी भी दी।
“राष्ट्र-विरोधी बयान देना और संसद को बाधित करना अस्वीकार्य है,” संसदीय कार्य मंत्री ने कहा। इससे राष्ट्र को नुकसान होता है क्योंकि इससे विधायी कार्य का कीमती समय बर्बाद होता है, जिस दौरान नागरिकों के लिए कई रचनात्मक कार्य किए जा सकते थे।
कुछ एजेंसियों के विश्लेषण से पता चला है कि 16 जुलाई, 2025 तक, बिहार के दस जिलों में से छह जिलों में, जिनमें मुस्लिम आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा है, में लंबित (pending) गणना फॉर्म की संख्या सबसे अधिक थी। इसमें सीमांचल क्षेत्र के चार जिले – अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार – के साथ-साथ सीतामढ़ी और पूर्वी चंपारण जिले शामिल हैं। ECI ने यह भी कहा कि “कुछ श्रेणियों के मतदाता विशेष रूप से कमजोर/ असुरक्षित/ संवेदनशील (vulnerable) हैं (SIR में) – प्रवासी मजदूर, मुस्लिम, विशेष रूप से ग्रामीण निर्धन।”
दरअसल ECI ने पूरे देश की मतदाता सूची का SIR करने का निर्णय लिया है। आइए देखें कि भारत का संविधान चुनाव प्रक्रिया के बारे में क्या कहता है। संविधान के अनुच्छेद 324(1) के अनुसार –
“इस संविधान के अधीन संसद और प्रत्येक राज्य के विधानमंडल के लिए तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए होने वाले सभी चुनावों के लिए निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और उनके संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण एक आयोग (जिसे इस संविधान में निर्वाचन आयोग कहा गया है) में निहित होगा।”
आधार अधिनियम
संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार, 21 वर्ष (अब 18 वर्ष) से अधिक आयु का कोई भी नागरिक किसी भी ऐसे चुनाव में मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार होगा। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act), 1950 की धारा 16 गैर-नागरिकों को मतदाता सूची में पंजीकृत होने से अयोग्य ठहराती है। ये Act भारत की चुनावी प्रक्रिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ECI के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया –
“आधार अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि आधार कार्ड नागरिकता का सबूत नहीं है। ECI आधार के दर्जे को ऊँचा नहीं कर सकता।”
ECI ने कहा कि ‘आधार कार्ड’ केवल पहचान को प्रमाणित करने वाला दस्तावेज है, न कि नागरिकता का।आधार गैर-नागरिकों को भी जारी किया गया था जो किसी स्थान पर सामान्य रूप से निवासी थे। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 20 ‘सामान्य रूप से निवासी’ शब्द का अर्थ प्रदान करती है। यह निर्दिष्ट करता है कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए ‘सामान्य रूप से निवासी’ नहीं माना जाएगा क्योंकि उसके पास उस निर्वाचन क्षेत्र में अपना मकान है। ECI ने पाया कि पिछले 20 वर्षों में, तेजी से शहरीकरण और पलायन के कारण मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर बदलाव होने की संभावना हैं। और भारत का संविधान ECI को यह सुनिश्चित करने का अधिकार देता है कि केवल भारत के नागरिक ही मतदाता सूची में शामिल हों। इसलिए, ECI ने पूरे देश के लिए SIR प्रारंभ करने का निर्णय लिया है । चूंकि बिहार में इस साल नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए उन्होंने बिहार से इस प्रक्रिया की शुरुआत की। ECI के वकील ने कहा कि बिहार में SIR आवश्यक था क्योंकि राज्य में मतदाता सूची की अंतिम गहन जांच 2003 में की गई थी। ECI ने कहा –
“पिछले एक दशक में लगभग 70 लाख लोग बिहार से पलायन कर चुके हैं। यह अपने आप में SIR के लिए एक ठोस और बुनियादी आधार प्रस्तुत करता है।”
2003 से 22 साल बीत चुके हैं, और दो दशक संभावित मतदाता सूची में बदलाव के लिए वास्तव में लंबा समय है! जिन मतदाताओं का पंजीकरण 2003 के SIR में हो चुका है, उन्हें कोई दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, 2003 के SIR के बाद पंजीकृत मतदाताओं को अपनी और अपने माता-पिता की जन्म तिथि और स्थान स्थापित करने के लिए दस्तावेज जमा करने होंगे।
जनसंख्या से ज्यादा आधार?
जनसंख्या से ज्यादा आधार?
बिहार के सीमांचल जिलों में जो मुस्लिम बहुल हैं, जैसे किशनगंज, कटिहार, अररिया, पूर्णिया में, आधार कार्ड की संख्या जनसंख्या से अधिक है। बिहार की औसत आधार कार्ड संतृप्ति 94% है, और इन सीमांचल जिलों में मुस्लिम आबादी और आधार कार्ड की संतृप्ति (Saturation) का प्रतिशत चौंकाने वाला है
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किशनगंज (68% मुस्लिम) – 126%
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कटिहार (44% मुस्लिम) – 123%
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अररिया (43% मुस्लिम) – 123%
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पूर्णिया (38% मुस्लिम) – 121%
यह डेटा बताता है कि इन क्षेत्रों में 100 लोगों पर 120 से अधिक आधार कार्ड हैं। सवाल यह उठता है कि ये अतिरिक्त आधार कार्ड किसको और क्यों जारी किए गए? ऐसा संदेह है कि इनमें से कई अवैध अप्रवासियों के हो सकते हैं, जिनका मूल पश्चिम बंगाल या केरल से जुड़ा हो सकता है।
इसका अर्थ ये हुआ कि इन क्षेत्रों में प्रति 100 लोगों पर 120 से अधिक आधार कार्ड हैं! यह कैसे संभव हो सकता है? इन अतिरिक्त घोस्ट आधार कार्ड्स को किसको और क्यों जारी किया गया? यह ध्यान देने योग्य है कि यह अजीब घटना केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हो रही है! ये तथ्य यह भी बताता है कि कुछ विपक्षी राजनीतिक दल आधार को नागरिकता के सबूत के रूप में क्यों बढ़ावा देना चाहते हैं! यह बताया जा रहा है कि इन अतिरिक्त आधार कार्ड्स में से अधिकांश पश्चिम बंगाल और केरल में उत्पन्न हो सकते हैं, और लाभार्थी मुस्लिम अवैध अप्रवासी हैं। यह ध्यान देना चाहिए कि इन दोनों ही राज्यों में मुस्लिम आबादी का बाहुल्य है!
क्यों जरूरी है SIR?
अतः, हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं एक प्रामाणिक मतदाता सूची जो केवल भारत के संविधान के अनुसार भारतीय नागरिकों को शामिल करती हो, के लिए SIR अनिवार्य है, ताकि उन लोगों का ध्यान रखा जा सके जो पलायन कर चुके हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, और जो अवैध अप्रवासी हैं (देश में कानूनी नागरिक नहीं हैं) – एक तरह से, मतदाता सूची का ‘स्वच्छीकरण’। नागरिकता मुख्य मानदंड है जो राष्ट्रवासियों को चुनाव में मतदान करने का पात्र बनाती है। इस प्रकार, मतदाता सूची का SIR वास्तव में लोकतंत्र के लिए ऑक्सीजन का काम करता है, और हम भारत के राष्ट्रांगों (राष्ट्र के अंग, अर्थात नागरिक) को इस अभ्यास का स्वागत करना चाहिए और इसमें पूर्ण समर्थन और सहयोग देना चाहिए!