सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की चेतावनी: AI से बन रहे ‘फर्जी निर्णय’, खतरे में न्यायिक प्रक्रिया
कानून और एआई का टकराव: 'बिना जांच के फर्जी निर्णय पेश करना न्यायिक विश्वसनीयता के लिए खतरा'
- न्यायाधीश राजेश बिंदल ने कानूनी शोध में एआई के बढ़ते दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई।
- उन्होंने कहा कि युवा वकील एआई द्वारा गढ़े गए ‘फर्जी निर्णयों’ को अदालतों में पेश कर रहे हैं।
- उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ताओं से युवाओं को मार्गदर्शन देने और इस खतरे के प्रति जागरूक करने का आग्रह किया।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 30 जुलाई, 2025: भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने न्यायिक प्रणाली के सामने उभर रहे एक नए और गंभीर खतरे पर प्रकाश डाला है। उन्होंने चेतावनी दी है कि युवा वकील कानूनी शोध के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग कर रहे हैं और कई बार बिना जांच के ही एआई द्वारा बनाए गए ‘फर्जी निर्णयों’ को अदालतों में पेश कर रहे हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता और विश्वसनीयता खतरे में है।
यह टिप्पणी तब आई जब ऑल इंडिया सीनियर लॉयर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक समारोह में हाल ही में नियुक्त किए गए चार नए न्यायाधीशों — न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची, न्यायमूर्ति निलय वी. अंजारिया, न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर — का सम्मान किया जा रहा था।
‘खतरे की घंटी’ बन रहा है एआई का दुरुपयोग
न्यायमूर्ति बिंदल ने अपने संबोधन में कहा, “भारत और अमेरिका दोनों में, युवा वकीलों द्वारा एआई सर्च मॉडल का उपयोग करते हुए फर्जी निर्णय अदालतों में प्रस्तुत किए गए हैं।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कई बार वकील केवल एक या दो कीवर्ड डालकर शोध करते हैं और एआई जो परिणाम देता है, वह या तो गलत होता है, अल्पमत की राय होती है या पूरी तरह से गढ़ा हुआ होता है। ऐसे निर्णयों को बिना सत्यापन के अदालत में पेश कर दिया जाता है।
इस प्रवृत्ति को “खतरे की घंटी” बताते हुए उन्होंने कहा कि एआई पर यह असीमित निर्भरता न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकती है। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ताओं से आग्रह किया कि वे आगे बढ़कर युवा अधिवक्ताओं को इन खतरों के प्रति जागरूक करें और उन्हें सही शोध का तरीका सिखाएं।
न्यायिक प्रक्रिया में सभी का योगदान
न्यायमूर्ति बिंदल ने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में जूनियर और सीनियर, दोनों वकीलों का योगदान अमूल्य होता है। “यह कहा जाता है कि निर्णय न्यायाधीश देते हैं, लेकिन उसका आधार अक्सर जूनियर वकीलों द्वारा किए गए गहन शोध और वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा दी गई दलीलों में होता है।”
इस समारोह में अन्य न्यायाधीशों और कानूनी दिग्गजों ने भी अपने विचार रखे। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं की तुलना “बरगद के वृक्ष” से की, जिसकी छाया में न्यायालय और विधि का शासन फलता-फूलता है। न्यायमूर्ति निलय वी. अंजारिया ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश होना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, जो केवल स्वयं के प्रति नहीं, बल्कि समाज के प्रति भी है।
न्यायिक सुधार और कानूनी बिरादरी की राय
इस अवसर पर उपस्थित इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ जुरिस्ट्स (लंदन) के अध्यक्ष डॉ. आदीश सी. अग्रवाला ने भारतीय न्यायपालिका की सराहना करते हुए कहा कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ न्याय प्रदान करने के मामले में विश्व के श्रेष्ठतम न्यायालयों में से एक है।
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पी. विल्सन ने बताया कि उन्होंने न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने हेतु संसद में एक निजी विधेयक पेश किया है, जिसे न्यायिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
न्यायमूर्ति बिंदल की यह टिप्पणी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में 20 जुलाई को केरल उच्च न्यायालय ने अपने न्यायिक कर्मचारियों को आदेश प्रारूप तैयार करने के लिए ChatGPT जैसे एआई उपकरणों का उपयोग न करने की सलाह दी थी। यह भारतीय न्यायिक प्रणाली में एआई के उपयोग पर दी गई अपनी तरह की पहली आधिकारिक सलाह थी, जिसने इस बहस को और हवा दे दी है। यह दर्शाता है कि जैसे-जैसे एआई तकनीक विकसित हो रही है, न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता को बनाए रखने के लिए नैतिक सतर्कता और मानवीय विवेक का महत्व बढ़ता जा रहा है।