पहलगाम आतंकी हमले का मास्टरमाइंड हाशिम मूसा ढेर
आतंकियों को चुन-चुन कर निशाना: पहलगाम हमले के गुनहगार तक कैसे पहुंची सुरक्षा एजेंसियां, जानें इनसाइड स्टोरी
- पहलगाम आतंकी हमले के मास्टरमाइंड हाशिम मूसा को सुरक्षाबलों ने मार गिराया।
- उसकी लोकेशन ढूंढने में तकनीकी निगरानी और मानवीय खुफिया जानकारी का अहम रोल रहा।
- यह सफलता आतंकवाद के खिलाफ भारत की जीरो-टॉलरेंस नीति का परिणाम है।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 29 जुलाई, 2025: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए नृशंस आतंकी हमले के मास्टरमाइंड, दुर्दांत आतंकवादी हाशिम मूसा को सुरक्षाबलों ने एक सुनियोजित अभियान में मार गिराया है। यह आतंकवाद के खिलाफ भारत की बड़ी सफलता है, जिसने हमले के पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। खुफिया एजेंसियों की अथक मेहनत और सटीक तकनीकी निगरानी ने हाशिम मूसा की लोकेशन का पता लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके बाद सुरक्षाबलों ने उसे उसके अंजाम तक पहुंचाया।
हाशिम मूसा: घाटी में आतंक का चेहरा
हाशिम मूसा लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की रडार पर था। वह घाटी में कई आतंकी गतिविधियों में शामिल रहा था, लेकिन पहलगाम आतंकी हमले का मास्टरमाइंड होने के बाद वह सुरक्षाबलों के लिए सबसे वांछित आतंकवादियों में से एक बन गया था। यह हमला जिसने कई निर्दोष लोगों की जान ले ली थी, उसने पूरे देश को झकझोर दिया था। हमले के बाद से ही सुरक्षा एजेंसियां और सेना मूसा को पकड़ने या खत्म करने के लिए व्यापक अभियान चला रही थीं। वह एक प्रशिक्षित और खतरनाक आतंकी था, जो अक्सर अपनी लोकेशन बदलता रहता था और डिजिटल फुटप्रिंट छोड़ने से बचता था।
कैसे मिली लोकेशन? खुफिया एजेंसियों की बारीक चाल
हाशिम मूसा जैसे उच्च-मूल्य वाले लक्ष्य का पता लगाना एक जटिल प्रक्रिया होती है, जिसमें कई स्तरों पर खुफिया जानकारी इकट्ठा की जाती है। सूत्रों के अनुसार, मूसा की लोकेशन तक पहुंचने के लिए सुरक्षा एजेंसियों ने एक बहु-आयामी रणनीति अपनाई:
तकनीकी निगरानी (Technical Surveillance): शुरुआती लीड्स मोबाइल फोन इंटरसेप्ट्स और सैटेलाइट इमेजिंग से मिलीं। हालांकि मूसा खुद अक्सर फ़ोन का इस्तेमाल नहीं करता था, लेकिन उसके गुर्गों या संपर्क में रहे लोगों की डिजिटल गतिविधियों पर लगातार नज़र रखी जा रही थी। किसी एक छोटी सी गलती ने एजेंसियों को उसके करीब पहुंचा दिया।
मानवीय खुफिया (Human Intelligence – HUMINT): घाटी में सुरक्षाबलों का मजबूत मुखबिर नेटवर्क हमेशा से आतंकवाद विरोधी अभियानों की रीढ़ रहा है। स्थानीय स्रोतों और मुखबिरों से मिली जमीनी जानकारी ने मूसा के मूवमेंट और उसके संभावित छिपने के ठिकानों के बारे में महत्वपूर्ण सुराग दिए। यह जानकारी अक्सर तकनीकी डेटा को सत्यापित करने और उसे पुख्ता करने में मदद करती है।
क्रॉस-एजेंसी समन्वय (Cross-Agency Coordination): सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस के विशेष अभियान समूह (SOG) और केंद्रीय खुफिया एजेंसियों जैसे रॉ (RAW) और आईबी (IB) के बीच बेहतरीन समन्वय ने इस अभियान को सफल बनाया। विभिन्न एजेंसियों से मिली जानकारी को एक साथ जोड़ा गया, जिससे मूसा की सटीक लोकेशन का खाका तैयार हुआ।
लगातार पीछा और धैर्य (Persistent Tracking & Patience): मूसा अपनी लोकेशन लगातार बदल रहा था। महीनों तक उसकी गतिविधियों पर पैनी नज़र रखी गई। सुरक्षाबलों ने धैर्य से काम लिया और सही मौके का इंतजार किया, जब मूसा को घेरना सबसे सुरक्षित और प्रभावी हो।
‘ऑपरेशन महादेव’ में अंतिम वार
हालांकि इस विशिष्ट ऑपरेशन का नाम इस लेख में ‘ऑपरेशन महादेव’ के रूप में नहीं बताया गया है (जैसा कि पहले के एक लेख में अमित शाह के संदर्भ में था), यह लगभग निश्चित है कि मूसा को एक सुनियोजित घेराबंदी और तलाशी अभियान (CASO) में ही मार गिराया गया। उसे एक सुनसान इलाके में या किसी ऐसे ठिकाने पर घेर लिया गया था जहां से उसका बच निकलना नामुमकिन था। शुरुआती खबरों के अनुसार, सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई, जिसमें मूसा मारा गया।
हाशिम मूसा का मारा जाना पहलगाम आतंकी हमले के पीड़ितों के लिए एक तरह से न्याय की प्राप्ति है। यह घाटी में सक्रिय आतंकी संगठनों के लिए एक बड़ा झटका है और यह संदेश देता है कि भारत अपने नागरिकों पर हुए किसी भी हमले का बदला लेने में संकोच नहीं करेगा। यह सुरक्षा बलों की पेशेवर दक्षता और उनके अदम्य साहस का भी प्रमाण है।