पूनम शर्मा
दिल्ली फिर एक बार बदलाव की उम्मीद में है। भाजपा को विरासत में एक ऐसा तंत्र मिला जो कई स्तरों पर जर्जर था — नीतिगत दिशाहीनता, बुनियादी ढांचे की उपेक्षा और संस्थागत टकराव ने दशकों से समस्याओं को स्थायी बना दिया है।
बिजली संकट: गर्मी और अंधकार साथ-साथ
दिल्ली की बिजली मांग 2024 में ही ऐतिहासिक 8656 मेगावॉट पार कर चुकी थी। वितरण कंपनियों ने उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ाने में तो रुचि ली, पर सप्लाई चेन को मजबूत करने में नहीं। नतीजा – गर्मी में बार-बार ट्रिप करता ट्रांसफार्मर, घंटों तक गुल होती बिजली और बेबस होती जनता।
जल संकट: रिसता पानी, सूखता भरोसा
दिल्ली जल बोर्ड रोजाना सिर्फ 1,000 एमजीडी पानी प्रदान कर पाता है, जबकि मांग 1,290 एमजीडी है। उस पर भी अधिकांश पानी लीकेज, चोरी और बिना मीटर कनेक्शन के निपट जाता है। यह न केवल तकनीकी फ़ेली, बल्कि यह सामाजिक और नैतिक संकट है — जहां एक समाज खुले नलों से गाड़ियों को धोता है, जबकि झुग्गियों में बूँद-बूँद की लड़ाई होती है।
जलभराव: हर मानसून में डूबती उम्मीदें
ड्रेनेज सिस्टम 1976 के मैप पर टिका है, जबकि आबादी 60 लाख से तीन करोड़ हो गई है। नई योजना 2011 से फाइलों में दबी पड़ी है। सरकारें बदलती रहीं, पर बारिश में दिल्ली की सड़कें आज भी पुराने गड्ढों में फँसी हैं। हाल ही में सीएम रेणुका गुप्ता ने कुछ बुनियादी नालों की सफाई की शुरुआत की, परन्तु सिस्टम की धीमी रफ्तार इसे टिकाऊ समाधान बनने से रोक रही है।
जिम्मेदारी अब स्पष्ट है: कोई बहाना नहीं चलेगा
इससे पूर्व जब एमसीडी, राज्य और केंद्र अलग-अलग दल थे, तो यह हर विफलता को दूसरों के सिर पर डाल देना सामान्य था। पर अब भाजपा के हाथ में वह बहाना नहीं। इस एकीकृत सत्ता संरचना ने सरकार को पूर्ण नियंत्रण तो दिया है, पर उसी अनुपात में जवाबदेही भी बढ़ा दी है। अब हर समस्या — बिजली, पानी, ड्रेनेज — सीधे भाजपा सरकार के प्रदर्शन से जुड़ी जाएगी।
समाधान की दिशा में क्या करना होगा ?
भाजपा के सामने दोहरा दबाव है — एक ओर अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की कमियों को ढकना, दूसरी ओर भविष्य के लिए नई उम्मीदें जगाना। इसके लिए सिर्फ “योजना” नहीं, “कार्यान्वयन की प्रतिबद्धता” जरूरी है:
बिजली वितरण कंपनियों पर दबाव डालकर ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करवाना।
DERC के साथ मिलकर एक व्यावहारिक, उपभोक्ता-अनुकूल टैरिफ नीति तैयार करना।
पानी की पाइपलाइन नेटवर्क को पूरी तरह से GPS मैप करना और लीक डिटेक्शन तकनीक लागू करना।
हरियाणा व उत्तर प्रदेश के साथ जल वितरण को लेकर ईमानदार और समयबद्ध संवाद शुरू करना।
ड्रेनेज मास्टरप्लान के लिए फंड को तेजी से रिलीज कर कार्यान्वयन की ज़िम्मेदारी तय करना।
मानवीय दृष्टिकोण: केवल आंकड़े नहीं, इंसान भी देखें
दिल्ली की समस्याएँ डेटा और चार्ट की नहीं हैं — वे आम आदमी की रोजमर्रा की जद्दोजहद की कहानियां हैं। बिजली कटाव से परेशान परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र, पानी भरने की लाइन में खड़ी महिलाएं, बारिश में ऑफिस जाने को जूझता एक दिहाड़ी मजदूर — यही असली पैमाना है शासन की सफलता या असफलता का।
सरकार को चाहिए कि वह नीतियों को जन-संवेदनशीलता से जोड़े। जन सुनवाई तंत्र को और पारदर्शी बनाए। वार्ड स्तर पर नागरिक समूहों के साथ साझेदारी कर बिजली और पानी जैसी सेवाओं की निगरानी में जनता को शामिल करे।
2026 की परीक्षा, 2025 की तैयारी से तय होगी
2025 की समस्याएँ भाजपा की नहीं हैं, लेकिन 2026 की नाकामी उसकी ही मानी जाएगी अगर आज कठोर निर्णय न लिए गए। अब जनता “कांग्रेस ने किया था”, “AAP ने कुछ नहीं किया” जैसे बहानों को मानने लायक नहीं है। अब परीक्षा सीधे BJP सरकार की प्रतिबद्धता, क्षमता और संवेदनशीलता की है।
डबल इंजन सरकार का दावा केवल तब टिकेगा, जब दोनों इंजन समन्वय से काम करें — राजनीतिक नहीं, प्रशासनिक। यदि दिल्ली में भाजपा एक उदाहरण प्रस्तुत कर पाई, तो यह मॉडल देश के अन्य महानगरों के लिए मिसाल बन सकता है। अन्यथा, दिल्ली की गंदी नालियों में फिर एक नया राजनीतिक नारा बह जाएगा।
प्रश्न अब यही है: क्या दिल्ली में दो इंजन चले तो गाड़ी रफ्तार पकड़ेगी, या पटरी से उतर जाएगी?