त्वचा के रंग पर ताना मारना क्रूरता नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम निर्णय: रंगभेद पर टिप्पणी 'मानसिक क्रूरता' नहीं, तलाक के आधार के रूप में अमान्य
- बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने कहा, त्वचा के रंग पर ताना मारना ‘क्रूरता’ नहीं है।
- अदालत ने एक महिला की तलाक की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
- यह फैसला घरेलू हिंसा कानूनों की व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण बहस छेड़ सकता है।
समग्र समाचार सेवा
नागपुर, महाराष्ट्र, 27 जुलाई, 2025: बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें उसने यह साफ किया कि किसी व्यक्ति के त्वचा के रंग पर ताना मारना या टिप्पणी करना ‘क्रूरता’ के दायरे में नहीं आता है, जिसके आधार पर तलाक मांगा जा सके। न्यायमूर्ति वृषाली जोशी की एकल पीठ ने एक महिला द्वारा अपने पति के खिलाफ दायर तलाक की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। यह फैसला घरेलू हिंसा से जुड़े कानूनों की व्याख्या और ‘मानसिक क्रूरता’ की परिभाषा को लेकर एक नई बहस छेड़ सकता है।
क्या था मामला? पत्नी ने लगाए थे गंभीर आरोप
मामला एक महिला और उसके पति के बीच का था। महिला ने अपने पति पर आरोप लगाया था कि वह लगातार उसके सांवले रंग को लेकर ताने मारता था, जिससे उसे मानसिक पीड़ा होती थी। पत्नी ने इसे मानसिक क्रूरता बताते हुए तलाक की मांग की थी। निचली अदालत ने महिला की याचिका को स्वीकार कर लिया था, जिसके बाद पति ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील की थी।
पति ने अपनी अपील में तर्क दिया कि उसने कभी भी अपनी पत्नी को उसके रंग के लिए ताना नहीं मारा और यहां तक कि अगर उसने ऐसा किया भी हो तो इसे क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। पति ने यह भी दावा किया कि पत्नी के लगाए गए आरोप निराधार हैं और उनका वैवाहिक जीवन सामान्य रहा है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी: ‘ताना क्रूरता नहीं’
न्यायमूर्ति वृषाली जोशी की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत के फैसले को पलट दिया। अदालत ने कहा, “यह स्वीकार करते हुए कि पति ने कभी-कभार पत्नी के रंग पर टिप्पणी की होगी, इसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता है।” इस धारा के तहत क्रूरता तलाक का आधार बनती है।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि ‘क्रूरता’ एक गंभीर आरोप है और इसे साबित करने के लिए पर्याप्त और पुख्ता सबूतों की आवश्यकता होती है। केवल कुछ टिप्पणियों या ताने को, जब तक कि वे अत्यधिक और लगातार पीड़ा का कारण न बनें, क्रूरता के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। अदालत ने पाया कि महिला पति पर क्रूरता का आरोप साबित करने में विफल रही।
घरेलू हिंसा कानूनों पर बहस
यह फैसला घरेलू हिंसा कानूनों के तहत ‘मानसिक क्रूरता’ की व्याख्या को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है। भारतीय न्याय प्रणाली में ‘क्रूरता’ की परिभाषा व्यापक रही है और इसमें शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक उत्पीड़न तीनों शामिल हैं। हालांकि, इस फैसले ने ‘मानसिक क्रूरता’ के दायरे को कुछ हद तक सीमित करने की कोशिश की है, खासकर जहां व्यक्तिगत विशेषताओं पर की गई टिप्पणियों का सवाल है।
इस फैसले के बाद समाज में इस बात पर बहस तेज हो सकती है कि क्या रंगभेद या शारीरिक बनावट पर की गई टिप्पणियों को ‘मानसिक क्रूरता’ के तहत शामिल किया जाना चाहिए या नहीं। यह फैसला उन वैवाहिक विवादों पर भी असर डाल सकता है जहां क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा जा रहा है, विशेषकर उन मामलों में जहां शारीरिक हिंसा शामिल नहीं है। यह कानूनी बिरादरी और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच इस मुद्दे पर आगे की चर्चा को बढ़ावा देगा।