AIIA में शल्य तंत्र पर राष्ट्रीय मंथन :आयुर्वेद और आधुनिकता का संगम

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  • AIIA ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय शल्य तंत्र सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ जोड़ने पर जोर दिया गया।
  • सम्मेलन में देशभर के आयुर्वेद विशेषज्ञों, शल्य चिकित्सकों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया, और चरक-सुश्रुत परंपरा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर चर्चा की।
  • पारंपरिक आयुर्वेदिक तकनीकों जैसे क्षारकर्म, अग्निकर्म और बंधन विधियों के साथ-साथ आधुनिक उपकरणों और पद्धतियों के संयोजन पर केस स्टडी और शोध प्रस्तुत किए गए।
  • आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा को मुख्यधारा की चिकित्सा शिक्षा में शामिल करने के लिए नीतिगत समर्थन का संकेत दिया, जिससे समग्र उपचार प्रणाली को बढ़ावा मिल सके

 

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 14 जुलाई — आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के बीच एक सेतु स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद (AIIA) ने राष्ट्रीय शल्य तंत्र सम्मेलन का सफल आयोजन किया। इस दो दिवसीय सम्मेलन का उद्देश्य प्राचीन आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा प्रणाली को आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वित करना और चिकित्सा क्षेत्र में एक समग्र दृष्टिकोण को बढ़ावा देना था।

AIIA के निदेशक डॉ. तनुजा नेसरी ने उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि “आयुर्वेद की समृद्ध शल्य तंत्र परंपरा को आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिक आधार के साथ प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। चरक और सुश्रुत जैसे महान आयुर्वेदाचार्यों की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं, बशर्ते उन्हें समकालीन शोध और उपकरणों के साथ जोड़ा जाए।”

सम्मेलन में देशभर के प्रतिष्ठित आयुर्वेद विशेषज्ञों, शल्य चिकित्सकों, अनुसंधानकर्ताओं और आयुष मंत्रालय के अधिकारियों ने भाग लिया। विषयवस्तु में शल्य चिकित्सा की पारंपरिक प्रक्रियाओं जैसे अग्निकर्म, क्षारकर्म, बंधन विधि के साथ-साथ लेप्रोस्कोपी, आधुनिक सर्जिकल उपकरण और पोस्ट-ऑपरेटिव केयर में आयुर्वेद की भूमिका पर गहन चर्चा हुई।

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा न केवल शरीर की शारीरिक समस्याओं को दूर करती है, बल्कि रोगी के मानसिक और भावनात्मक पक्ष पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है। सम्मेलन में कई केस स्टडी भी प्रस्तुत की गईं जिनमें आयुर्वेदिक शल्य पद्धति से सफल उपचार हुए थे।

आयुष मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सरकार इस क्षेत्र में अनुसंधान और शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए नई नीतियों पर विचार कर रही है, ताकि आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा को चिकित्सा शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके।

AIIA द्वारा आयोजित यह सम्मेलन न केवल आयुर्वेदिक चिकित्सा समुदाय के लिए प्रेरणास्रोत बना, बल्कि देशभर के मेडिकल छात्रों और शोधकर्ताओं को पारंपरिक ज्ञान के वैज्ञानिक पुनर्पाठ के लिए एक मंच भी उपलब्ध कराया।

यह आयोजन दर्शाता है कि भारत अपनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था में स्थान दिलाने की दिशा में गंभीर प्रयास कर रहा है। समग्र चिकित्सा प्रणाली ही भविष्य की कुंजी बन सकती है, जिसमें शरीर, मन और आत्मा—तीनों का उपचार एक साथ संभव है।

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