अशोक कुमार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस यात्रा को एक ऐसे समय में रणनीतिक महत्व दिया जा रहा है जब तुर्किये लगातार पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को गहरा कर रहा है। यह यात्रा न केवल भारत के लिए साइप्रस के महत्व को रेखांकित करती है, बल्कि पूर्वी भूमध्य सागर में भू-राजनीतिक समीकरणों में तुर्किये की बढ़ती भूमिका के प्रति भी एक स्पष्ट संकेत है। आइए विस्तार से जानते हैं कि साइप्रस भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है और इस पूरे समीकरण में तुर्किये की भूमिका क्या है।
साइप्रस की भौगोलिक स्थिति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
साइप्रस, पूर्वी भूमध्य सागर में स्थित एक द्वीप राष्ट्र है, जो तुर्किये और सीरिया के करीब है। भौगोलिक रूप से एशिया में स्थित होने के बावजूद, यह यूरोपीय संघ (ईयू) का सदस्य है। साइप्रस की जनसंख्या मुख्य रूप से ग्रीक साइप्रस और अल्पसंख्यक तुर्किये साइप्रस से मिलकर बनी है। ऐतिहासिक रूप से, ग्रीक साइप्रस के लोग ग्रीस के साथ एकीकरण की आकांक्षा रखते थे, जबकि तुर्किये साइप्रस के लोग अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए द्वीप के विभाजन की वकालत करते थे।
साइप्रस 300 वर्षों के ओटोमन शासन के बाद 1878 में ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया। 1960 में, साइप्रस को स्वतंत्रता मिली, और एक संविधान स्थापित किया गया जिसने ग्रीक साइप्रस और तुर्किये साइप्रस के बीच सत्ता-साझाकरण की व्यवस्था की। “गारंटी संधि” ने ब्रिटेन, ग्रीस और तुर्किये को इस व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया।
विभाजन की त्रासदी: तुर्किये का हस्तक्षेप
1963 में, तत्कालीन राष्ट्रपति मकारियोस ने सत्ता-साझाकरण व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव रखा, जिसके परिणामस्वरूप अंतर-सामुदायिक हिंसा भड़क उठी और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना की स्थापना करनी पड़ी। मकारियोस के ग्रीस के साथ एकीकरण के लक्ष्य को त्यागने के बाद, ग्रीक साइप्रस ने ग्रीक जुंटा की सहायता से तख्तापलट किया। इसके कुछ ही दिनों बाद, तुर्किये सेना ने तुर्किये साइप्रस समुदाय की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए साइप्रस पर आक्रमण कर दिया।
इस आक्रमण के परिणामस्वरूप ग्रीक साइप्रस के लोग अपने घरों से भागने लगे। तुर्किये सेना ने द्वीप के लगभग 37 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिससे साइप्रस दो भागों में विभाजित हो गया। यह विभाजन आज भी “ग्रीन लाइन” के साथ वास्तविक सीमा के रूप में बना हुआ है। इस विभाजन के कारण लगभग 1.65 लाख ग्रीक साइप्रस लोगों को तुर्किये के कब्जे वाले उत्तर से भागना पड़ा, जबकि लगभग 45,000 तुर्किये साइप्रस के लोग दक्षिण से उत्तर की ओर चले गए।
उत्तरी साइप्रस: एक अनसुलझा मुद्दा
1975 में, तुर्किये साइप्रस ने एक स्वतंत्र प्रशासन की स्थापना की, जिसके अध्यक्ष राउफ डेंकटैश बने। 1983 में, डेंकटैश ने “तुर्किये गणराज्य उत्तरी साइप्रस” की घोषणा की, जिसे केवल तुर्किये ने मान्यता दी। हालांकि, भारत सहित दुनिया के अधिकांश देश साइप्रस गणराज्य को मान्यता देते हैं और पूरे द्वीप पर इसकी संप्रभुता का समर्थन करते हैं। यह स्थिति साइप्रस विवाद को एक जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाती है।
भारत के लिए साइप्रस का महत्व और तुर्किये की भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी की साइप्रस यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण है:
रणनीतिक स्थिति: साइप्रस पूर्वी भूमध्य सागर में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान पर स्थित है, जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका के समुद्री मार्गों के चौराहे पर है। यह क्षेत्र ऊर्जा संसाधनों (विशेषकर प्राकृतिक गैस) के लिए भी महत्वपूर्ण है।
तुर्किये को संदेश: पाकिस्तान के साथ तुर्किये के बढ़ते रक्षा और आर्थिक संबंध, और कश्मीर मुद्दे पर तुर्किये का भारत विरोधी रुख, भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। साइप्रस के साथ भारत के गहरे संबंध तुर्किये को एक स्पष्ट संकेत देते हैं कि भारत अपने हितों की रक्षा के लिए क्षेत्रीय साझेदारी मजबूत कर रहा है।
यूरोपीय संघ के साथ संबंध: साइप्रस यूरोपीय संघ का सदस्य होने के नाते, भारत को यूरोपीय संघ के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने का एक मंच प्रदान करता है।
निवेश और व्यापार: साइप्रस एक आकर्षक निवेश गंतव्य और भारत के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार रहा है। यह यात्रा आर्थिक सहयोग को और बढ़ावा दे सकती है।
संयुक्त राष्ट्र में समर्थन: साइप्रस, भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए दावे का एक मजबूत समर्थक रहा है।
संक्षेप में, साइप्रस तुर्किये की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के खिलाफ एक महत्वपूर्ण मोर्चा प्रस्तुत करता है। भारत की साइप्रस यात्रा इस बात का प्रतीक है कि नई दिल्ली तुर्किये की पाकिस्तान-केंद्रित नीतियों को लेकर गंभीर है और अपनी रणनीतिक साझेदारी को विविधतापूर्ण बनाने के लिए तैयार है ताकि क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखा जा सके।