चार राज्यों का सियासी भविष्य : तमिलनाडु, केरलम, असम, प. बँगाल

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
पूनम शर्मा
सत्ता और असंतोष का संतुलन

भारत के चार प्रमुख राज्यों—केरल, असम, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु—का राजनीतिक मिजाज इस समय मंथन के दौर में है। सर्वेक्षणों (जैसे सी-वोटर) के आंकड़ों को अगर हम एक बड़ी तस्वीर के रूप में देखें, तो देश के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में जनभावना बिल्कुल अलग दिशा में बह रही है। जहाँ असम और बंगाल में लोग मौजूदा सरकार के काम से मोटे तौर पर संतुष्ट दिख रहे हैं, वहीं केरल और तमिलनाडु में बदलाव की एक गहरी छटपटाहट महसूस की जा सकती है।

केरल: कांग्रेस के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति

केरल की राजनीति हमेशा से हर पाँच  साल में सत्ता बदलने के लिए जानी जाती रही है, लेकिन 2021 में वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चे (LDF) ने इस परंपरा को तोड़कर इतिहास रचा था। हालांकि, अब स्थिति बदल रही है। 10 साल की ‘एंटी-इनकंबेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) का असर साफ दिख रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, केरल के लगभग आधे लोग अपनी सरकार बदलना चाहते हैं।

यहाँ सबसे चौंकाने वाली बात मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की घटती लोकप्रियता है। आमतौर पर मुख्यमंत्री ही सबसे लोकप्रिय चेहरा होता है, लेकिन केरल में विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन और शशि थरूर की रेटिंग उनसे बेहतर दिख रही है। अगर कांग्रेस यहाँ अपनी गुटबाजी पर काबू पा लेती है, तो उसके पास सत्ता में वापसी का सुनहरा मौका है। भाजपा यहाँ ‘तीसरे कोण’ के रूप में उभर रही है, जो लेफ्ट के वोट बैंक में सेंध लगा रही है। अगर भाजपा का ग्राफ बढ़ता है, तो इसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिल सकता है।

असम: हिमंत बिस्वा सरमा का अभेद्य किला

असम में कहानी बिल्कुल उलट है। यहाँ लोग सरकार पलटना नहीं चाहते। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की लोकप्रियता का ग्राफ विपक्षी नेता गौरव गोगोई से कहीं ऊपर है। असम की राजनीति अब पूरी तरह से ‘ध्रुवीकरण’ और ‘विकास’ के दोहरे ट्रैक पर चल रही है। मुस्लिम बहुल इलाकों और हिंदू बहुल इलाकों के बीच का अंतर इतना स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा के लिए 100 से ज्यादा सीटों पर जीत की राह आसान लग रही है। कांग्रेस के कई बड़े नेताओं का भाजपा में शामिल होना विपक्षी खेमे को कमजोर कर चुका है। आज की स्थिति में असम में भाजपा को चुनौती देना किसी भी दल के लिए बहुत कठिन नजर आता है।

पश्चिम बंगाल: ममता बनर्जी और ‘बंगाली अस्मिता’ का जादू

पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 40% वोट शेयर के साथ अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं, लेकिन ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करना अभी भी एक ‘टेढ़ी खीर’ बना हुआ है। बंगाल की राजनीति में तीन बड़े कारक ममता के पक्ष में हैं: 30% मुस्लिम वोट बैंक, महिलाओं का अटूट समर्थन और भाजपा का अभी भी ‘शहरी पार्टी’ से पूरी तरह बाहर न निकल पाना। भाजपा ने ग्रामीण इलाकों में विस्तार तो किया है, लेकिन ममता का ‘भद्रलोक’ और स्थानीय जुड़ाव उन्हें सुरक्षित रखता है। बंगाल में भाजपा को अभी और धैर्य रखने की जरूरत है, क्योंकि वहाँ  की राजनीति अब ‘दीदी बनाम भाजपा’ के बीच एक लंबी जंग में तब्दील हो चुकी है।

तमिलनाडु: विजय फैक्टर और नया समीकरण

तमिलनाडु में सत्ता विरोधी लहर तो है, लेकिन विपक्ष बिखरा हुआ है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की रेटिंग अच्छी है, फिर भी लोग बदलाव की बात कर रहे हैं। यहाँ अभिनेता विजय की पार्टी (TVK) ने खलबली मचा दी है। हालांकि उनका ग्राफ शुरुआती उछाल के बाद थोड़ा स्थिर हुआ है, लेकिन वे किसका खेल बिगाड़ेंगे, यह सबसे बड़ा सवाल है। अगर विजय का वोट शेयर बढ़ता है, तो वह AIADMK और भाजपा के गठबंधन (NDA) के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है, जिससे अंततः DMK का रास्ता साफ हो सकता है।

निष्कर्ष: 2029 की राह

इन राज्यों के नतीजे केवल स्थानीय नहीं होंगे। अगर कांग्रेस केरल हारती है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए उसका नैरेटिव ध्वस्त हो जाएगा। वहीं, भाजपा के लिए बंगाल और तमिलनाडु में वोट शेयर बढ़ाना एक लंबी अवधि के निवेश जैसा है।

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
Leave A Reply

Your email address will not be published.