नई पीढ़ी का उदय और भारतीय राजनीति

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पूनम शर्मा
नई पीढ़ी का उदय और संसद की ओर कदम

भारतीय राजनीति में एक ओर जहाँ  अनुभवी नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी भी तेजी से अपनी जगह बना रही है। इसी कड़ी में नितिन नबीन 10 अप्रैल को राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं। यह घटना सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक निरंतरता और बदलाव के बीच संतुलन का प्रतीक है।

राज्यसभा में इन दोनों नेताओं का प्रवेश उस समय हो रहा है, जब देश के अलग-अलग हिस्सों में नई सोच और युवा नेतृत्व तेजी सेबढ़ता दिखाई दे रहा है। खासकर पूर्वोत्तर राज्य असम में यह बदलाव साफ तौर पर नजर आ रहा है।

असम में चुनावी हवा बदली

असम में 9 अप्रैल को होने वाले चुनाव कई मायनों में खास माने जा रहे हैं। लगभग 6.28 लाख नए मतदाता, जिनकी उम्र 18 से 19 वर्ष के बीच है, पहली बार मतदान करेंगे। यह आंकड़ा बताता है कि राज्य की राजनीति अब युवाओं के प्रभाव से अछूती नहीं रह सकती।

इन चुनावों में 126 विधानसभा सीटों पर मुकाबला है, लेकिन असली चर्चा उम्मीदवारों के प्रोफाइल को लेकर है। पारंपरिक राजनीतिक परिवारों की जगह अब पढ़े-लिखे, पेशेवर और जमीनी स्तर से जुड़े युवा चेहरे चुनावी मैदान में उतर रहे हैं।

युवा उम्मीदवारों की नई सोच

गुवाहाटी सेंट्रल से 27 वर्षीय कुनकी चौधरी जैसे उम्मीदवार इस बदलाव का चेहरा हैं। लंदन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट करियर छोड़कर समाजसेवा का रास्ता चुना। उनके अभियान में स्किल डेवलपमेंट, महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख हैं।

वहीं समागुड़ी से कांग्रेस उम्मीदवार तंजिल हुसैन जोकि रोकीबुल  हुसैन के बेटे भी चर्चा में हैं। वे राजनीतिक परिवार से आते हैं, लेकिन खुद को एक युवा और नई सोच वाले नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।

जमीनी आंदोलन से राजनीति तक

मार्घेरिटा से रायजोर दल के राहुल चेतरी का सफर अलग है। छात्र आंदोलनों और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों से उभरकर वे राजनीति में आए हैं। उनका नारा “जमीन और लोगों की लड़ाई बनाम पैसे और सत्ता” युवाओं को खासा आकर्षित कर रहा है।

इसी तरह मरियानी से ज्ञानश्री बोरा, जो पीएचडी धारक हैं, उन्होंने एक अच्छी नौकरी छोड़कर राजनीति का रास्ता चुना। उनके मुद्दों में स्वास्थ्य सेवाएं, महिला सुरक्षा और स्थानीय प्रशासन शामिल हैं।

विविध पृष्ठभूमि, एक साझा लक्ष्य

बराक वैली के जुबैर अनम मजूमदार, जो पेशे से आर्किटेक्ट हैं, और हाफलोंग की रुपाली लांगथासा, जो जनजातीय मुद्दों पर काम कर चुकी हैं—ये सभी उम्मीदवार अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं। लेकिन इन सभी का लक्ष्य एक ही है—राजनीति को अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और मुद्दा-आधारित बनाना।

बदलाव की आहट

जहाँ  एक ओर नितिन नबीन जैसे नेता राज्यसभा में अपनी भूमिका निभाने जा रहे हैं, वहीं असम जैसे राज्यों में युवा नेतृत्व नई दिशा तय कर रहा है। यह स्पष्ट संकेत है कि भारतीय राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर है, जहाँ अनुभव और ऊर्जा—दोनों का संतुलन जरूरी है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह युवा लहर सिर्फ चुनाव तक सीमित रहती है या वास्तव में नीति और शासन के स्तर पर भी बड़ा बदलाव लाती है।

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