मुर्शिदाबाद :रामनवमी पर हिंसा ममता बनर्जी की उकसाने वाली गंदी राजनीति
चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास ममता बनर्जी कर रही हैं
पूनम शर्मा
पश्चिम बंगाल एक बार फिर सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहा है, और इस बार निशाना बना है मुर्शिदाबाद। रामनवमी के पावन अवसर पर निकली शोभायात्रा के दौरान हुई झड़पों, आगजनी और पत्थरबाजी ने राज्य में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव को उजागर कर दिया है। इन घटनाओं को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रुख सवालों के घेरे में है, और उन पर हिंसा भड़काने के आरोप लग रहे हैं मुर्शिदाबाद में भी कई ऐसे इलाके हैं, जहाँ पर रामनवमी को लेकर यात्रा निकाली जा रही थी और बताया जा रहा है कि छोटी सी बात पर दोनों पक्षों के बीच में कहासुनी हुई, मारपीट तक नौबत आई और उसके बाद हालात ऐसे हो गए कि फिर आगजनी भी देखी गई, पत्थरबाजी भी देखी गई। अब पुलिस बल को बुलाया गया, सुरक्षा बल वहाँ पर तैनात हुए भी नजर आए । तनावपूर्ण अभी भी उनके मुंह से ये बात कही जा रही है तो क्या हुआ है मुर्शिदाबाद में? क्यों रामनवमी के दिन ये बवाल हुआ है? आज इसे समझने की कोशिश करेंगे और कौन ये सारी चीजें बंगाल में करा रहा है, इसके पीछे की क्या है?
रामनवमी पर मुर्शिदाबाद में हिंसा: एक चिंताजनक पैटर्न
यह कोई पहली बार नहीं है जब बंगाल में किसी हिंदू त्योहार के दौरान हिंसा की खबरें आई हों। पिछले 24 घंटों में मुर्शिदाबाद में मनसा पूजा के दौरान हिंसा की घटनाओं की चर्चा हो चुकी है, जहां कथित तौर पर छोटे-छोटे कारणों पर हिंदुओं को निशाना बनाया गया। अब रामनवमी के जुलूस पर हुए हमले ने इस पैटर्न को और भी स्पष्ट कर दिया है। बताया जा रहा है कि एक साधारण सी बात पर दोनों पक्षों के बीच कहासुनी हुई, जो जल्द ही मारपीट, पथराव और आगजनी में बदल गई। तस्वीरें बताती हैं कि डीजे तोड़े गए, रामनवमी के झंडे उतारे गए और दुकानों में आग लगाई गई। सवाल उठता है कि ये घटनाएँ क्या स्वत:स्फूर्त थीं या किसी पूर्वनियोजित साजिश का हिस्सा?
ममता बनर्जी का बयान और आरोपों का घेरा
इस पूरे मामले पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान और उनके द्वारा लगाए गए आरोपों पर गौर करना महत्वपूर्ण है।
ममता बनर्जी ने अपने भाषणों में टी एम सी के कार्यकर्ताओं को तोड़ फोड़ करने का संदेश दिया और मुर्शिदाबाद हिंसा को “पूर्व नियोजित” बताते हुए भाजपा और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) पर गंभीर आरोप लगाए हैं । उन्होंने दावा किया है कि ये दोनों ही संस्थाएँ राज्य में “सांप्रदायिक तनाव फैलने” और “घुसपैठ कराकर अशांति” पैदा करने में शामिल हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर नजर रखने का आग्रह भी किया है ।
अल्पसंख्यकों के गुस्से को “जायज” ठहराना:
हाल ही में मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में हुए उग्र प्रदर्शनों को भी ममता बनर्जी ने “जायज” ठहराया था। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय का गुस्सा “जायज” है, जो प्रवासी श्रमिकों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं के कारण हुआ । इस तरह के बयान हिंसा को एक समुदाय विशेष के “गुस्से” के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो अन्य समुदायों में आक्रोश और “दूसरे पक्ष” पर आक्रामक होने का आरोप लगाने का मौका देता है।
घरेलू हथियार” उठाने का आह्वान:
एक चौकाने वाली खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के एक भाषण का संज्ञान लिया है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर अपनी पार्टी के कैडर से कहा था कि जब उन्हें सीआरपीएफ और सैन्य बल या चुनाव कर्मी दिखें, तो घर में मौजूद बर्तनों और हथियारों के साथ उनका सामना करें, यह कहते हुए कि महिलाएँ सुरक्षित रहेंगी। यह बयान सीधे तौर पर हिंसा को उकसाने और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के लिए लोगों को भड़काने की श्रेणी में आता है, खासकर चुनाव आयोग के अधिकारियों और केंद्रीय बलों के खिलाफ।
उकसाहट या राजनीतिक मजबूरी?
ममता बनर्जी के इन बयानों को केवल चुनावी रणनीति के रूप में देखना शायद पूरी तस्वीर न हो। बंगाल की राजनीति हमेशा से जटिल रही है, और सांप्रदायिक समीकरण यहाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चुनावी ध्रुवीकरण:
आने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनजर, ममता बनर्जी भाजपा पर सांप्रदायिक राजनीति करने और अशांति फैलाने का आरोप लगाकर अपने पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट करने का प्रयास कर सकती हैं। ममता बनर्जी हिंदू विरोधी और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करने का काम रही है।
टीएमसी कार्यकर्ताओं को संदेश: “घरेलू हथियार” उठाने का आह्वान पार्टी कार्यकर्ताओं को चुनाव के दौरान केंद्रीय बलों के खिलाफ खड़ा होने और चुनावी प्रक्रिया को हथियार या बलपूर्वक बाधित करने के लिए एक संकेत हो सकता है।
वक्फ संशोधन अधिनियम:
ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी से वक्फ संशोधन अधिनियम को लागू नहीं करने का आग्रह भी किया है । इसका विरोध एक समुदाय विशेष को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास हो सकता है।
मुर्शिदाबाद में रामनवमी पर हुई हिंसा और उसके बाद की राजनीतिक बयानबाजी एक गहरी चिंता का विषय है। मुख्यमंत्री के रूप में, ममता बनर्जी की पहली जिम्मेदारी राज्य में शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, किसी भी समुदाय को उकसाने या हिंसा को वैधता प्रदान करने के बजाय। भाजपा के “हिंदू-मुस्लिम में दंगा कराने की कोशिश” के आरोपों और ममता बनर्जी के “अल्पसंख्यकों का गुस्सा जायज” जैसे बयान राज्य के सांप्रदायिक ताने-बाने को और कमजोर करते हैं। राज्य पुलिस अधिकारी खुद कहते हैं कि स्थिति “तनावपूर्ण” है, तो यह जिम्मेदारी बनती है कि चुनाव के समय राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप सामान्य हैं, लेकिन जब ये बयानबाजी सीधे तौर पर हिंसा को उकसाने या उसे उचित ठहराने की ओर इशारा करती है, तो यह लोकतंत्र और सामाजिक शांति के लिए गंभीर खतरा बन जाती है। चुनाव आयोग को स्थिति पर कड़ी नजर रखनी चाहिए और हिंसा भड़काने वाले किसी भी बयान या कार्रवाई पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।