पूनम शर्मा
केरल स्थित सबरीमाला मंदिर एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड ने(भारत का उच्चतम न्यायालय) के समक्ष स्पष्ट किया है कि मंदिर में किसी प्रकार का स्त्री-पुरुष भेदभाव नहीं किया जाता, बल्कि कुछ आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर जो प्रतिबंध है, वह प्राचीन धार्मिक परंपरा का हिस्सा है।
त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड के अनुसार, दस से पचास वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक कोई नया नियम नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही परंपरा है। इस परंपरा का संबंध भगवान अयप्पा के नैष्ठिक ब्रह्मचर्य से जुड़ा हुआ है। भगवान अयप्पा को ऐसे तपस्वी के रूप में माना जाता है, जिन्होंने जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया। यही कारण है कि मंदिर के नियम भी उसी आध्यात्मिक अनुशासन को दर्शाते हैं।
सबरीमाला केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि कठोर साधना का केंद्र है। यहां आने वाले श्रद्धालु इकतालीस दिनों तक संयम, व्रत और शुद्ध आचरण का पालन करते हैं। यह पूरी प्रक्रिया आत्मसंयम और आध्यात्मिक उन्नति के लिए होती है। ऐसे में त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड का कहना है कि कुछ आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध इस साधना की निरंतरता बनाए रखने के लिए है, न कि किसी को कमतर दिखाने के लिए।
त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड ने अपने पक्ष में विभिन्न शोधों का भी उल्लेख किया है। इन अध्ययनों में यह बताया गया है कि यह परंपरा किसी भेदभाव की भावना से नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर विकसित हुई है। इसका उद्देश्य किसी के अधिकारों का हनन करना नहीं, बल्कि परंपरा की मूल भावना को बनाए रखना है।
न्यायिक हस्तक्षेप
इस पूरे विषय का एक महत्वपूर्ण पहलू न्यायिक हस्तक्षेप का है। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में, जहां हर परंपरा और मान्यता की अपनी विशिष्ट पहचान है, वहाँ यह प्रश्न स्वाभाविक है कि न्यायालय की भूमिका कितनी होनी चाहिए। क्या हर धार्मिक परंपरा को समानता के आधुनिक दृष्टिकोण से परखा जाना चाहिए, या फिर कुछ मामलों में आस्था और परंपरा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए?
सबरीमाला का मामला इसी संतुलन की चुनौती को सामने लाता है। एक ओर समानता और अधिकारों की बात है, तो दूसरी ओर आस्था और परंपरा की गहराई है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि किसी भी निर्णय से पहले उस परंपरा के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ को समझा जाए।
त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड का स्पष्ट मानना है कि परंपराओं को बिना समझे उनमें हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। उन्होंने भारत के उच्चतम न्यायालय से आग्रह किया है कि इस मामले में धार्मिक मान्यताओं का सम्मान किया जाए और अनावश्यक दखल से बचा जाए।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भगवान अयप्पा के देशभर में अनेक मंदिर हैं, जहाँ सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति है। लेकिन सबरीमाला की अपनी एक विशेष पहचान और परंपरा है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है। इसी विशिष्टता को बनाए रखना आवश्यक माना जा रहा है।
परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
अंततः यह मुद्दा केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रश्न से जुड़ा है कि क्या हम अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को उनके मूल स्वरूप में संरक्षित रख सकते हैं। आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन यह जरूरी है कि इस प्रक्रिया में सभी पक्षों की भावनाओं का सम्मान किया जाए। यह एक अति दुख का विषय है कि हिन्दू मंदिरों पर अपनी परंपराओं और आस्था को संरक्षित रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और इससे अधिक दुख का विषय यह है कि चुनौती देने वाले हिन्दू ही हैं। अपने धर्म एवं परंपराओं के विषय में जानने के स्थान पर अदालतों में इन विषयों को ले जाना इस बात का परिचायक है कि भारत की हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति को नष्ट करने के लिए किस प्रकार शक्तियाँ कार्यरत हैं ।
सबरीमाला हमें यह सोचने पर विवश करता है कि बदलते समय में भी हमारी जड़ें कितनी महत्वपूर्ण हैं। समाधान शायद इसी में है कि संवाद, संवेदनशीलता और परस्पर सम्मान के साथ आगे बढ़ा जाए, ताकि परंपरा भी सुरक्षित रहे और समाज भी संतुलित रूप से आगे बढ़ सके।