डॉ पीयूष मिश्र
नई दिल्ली 22 मार्च : नई दिल्ली के केशवकुंज, झंडेवालान स्थित अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केंद्रीय कार्यालय में “नामूलं लिख्यते किञ्चित” व्याख्यानमाला के तीसरे सफल आयोजन में ‘सरस्वती तट की वैदिक सभ्यता: इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व’ विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान संपन्न हुआ। यह आयोजन भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रांत और माधव संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. शुभम केवलिया, शहीद भगत सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य, ने अपने शोधपरक अध्ययन और उद्बोधन के माध्यम से वैदिक सरस्वती के ऐतिहासिक महत्व और वैदिक जनों के लिए इसके महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने दृढ़तापूर्वक यह बात रखी कि वैदिक संस्कृति वास्तव में हड़प्पा सभ्यता से भी प्राचीन थी और उसके समानांतर विकसित हो रही थी।
डॉ. केवलिया ने इस पर जोर दिया कि मार्क्सवादी इतिहासकारों के एक समूह ने वैदिक सरस्वती के अस्तित्व को नकारने का भरसक प्रयास किया, जिसका उद्देश्य सनातनी हिन्दू धर्म के आधारभूत ग्रंथ ऋग्वेद की प्रामाणिकता को समाप्त करना था। हालांकि, उन्होंने वर्तमान वैज्ञानिक पद्धतियों जैसे जीपीएस और सैटेलाइट के साक्ष्यों का हवाला देते हुए बताया कि सरस्वती नदी का सूखना 2500-3000 ईसा पूर्व का है, और इन तथ्यों के आधार पर इसके अस्तित्व को कतई नकारा नहीं जा सकता। ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं और महाभारत के श्लोकों में भी सरस्वती के सूखने के प्रमाण मिलते हैं।
अपने डिजिटल प्रस्तुतिकरण के साथ डॉ. शुभम ने सरस्वती नदी से जुड़े प्रामाणिकता संबंधित अनेक पक्षों को प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरस्वती और घग्गर नदी में कोई अंतर नहीं है। उन्होंने हड़प्पा सभ्यता में नदी सूखने के बाद सरस्वती के चैनल पर जल संरक्षण के पुरातात्विक साक्ष्यों, हड़प्पा से प्राप्त यज्ञ वेदी के प्रमाणों, घोड़े की मृण्मूर्ति और हड्डियों की प्राप्ति, शिवलिंग, स्पोकड व्हील के खिलौनों, और रथों का उल्लेख किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ऋग्वेद की ऋचाओं में ईंटों से निर्मित भवनों के उल्लेख, शवपेटिका पर इंद्र के अंकन, और सूर्य की किरणों के अंकन जैसे साक्ष्यों को वैदिक संस्कृति को हड़प्पा का पूरक बताने के लिए पर्याप्त बताया। इन बिंदुओं ने उन मार्क्सवादी दावों को खंडित किया, जिन्होंने इन ऐतिहासिक तथ्यों पर प्रश्न चिह्न लगाने का प्रयास किया था। राखीगढ़ी और सिनौली से प्राप्त कंकालों में एक समान जेनेटिक्स के मिलने से आर्य आगमन का सिद्धांत पूरी तरह मनगढ़ंत साबित हो चुका है।
इस व्याख्यानमाला में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय का सान्निध्य और पाथेय भी प्राप्त हुआ। उन्होंने अपने ओजपूर्ण और ज्ञानवर्धक वक्तव्य में कहा कि अंग्रेजों ने अपने शासन की वैधता स्थापित करने के लिए आर्य आगमन जैसी कुत्सित अवधारणाओं को जन्म दिया। उन्होंने यह भी बताया कि अंग्रेजों ने ‘घर घर स्वर’ (एक स्थानीय मुहावरा) से प्रेरित होकर उस नदी का नाम घाघरा कर दिया। डॉ. पाण्डेय ने बताया कि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना ने ऐसी अवधारणाओं को समाप्त करने के लिए संगोष्ठियां की हैं और देश भर के विद्वानों, जिनमें बी.बी. लाल और टी.पी. वर्मा जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं, को इन विषयों पर लिखने के लिए प्रेरित किया है। उन्होंने बताया कि प्रो. वाकणकर ने 35 दिनों की पैदल यात्रा कर सरस्वती चैनल का पूरा सर्वेक्षण किया था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय इतिहास संकलन समिति, दिल्ली प्रांत के अध्यक्ष प्रो. धर्मचंद चौबे ने की। भारतीय इतिहास संकलन समिति, दिल्ली प्रांत के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. प्रवीण गर्ग ने वक्ता डॉ. शुभम केवलिया की भूरि-भूरि प्रशंसा की। मंगलाचरण श्री आकाश अवस्थी (योजना, विस्तारक) द्वारा किया गया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. पंकज सिंह (सह संगठन मंत्री, भारतीय इतिहास संकलन समिति, दिल्ली प्रांत) ने प्रस्तुत किया और कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. अस्मित शर्मा (कार्यालय प्रमुख, दिल्ली प्रांत) द्वारा किया गया।
इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में संरक्षक सदस्य प्रो. रमेश कुमार मिश्रा, प्रो. अखिलेश कुमार दुबे (उपाध्यक्ष, भारतीय इतिहास संकलन समिति, दिल्ली प्रांत), डॉ. निर्मल पाण्डेय (महासचिव, भारतीय इतिहास संकलन समिति, दिल्ली प्रांत), डॉ. अजय सिंह (संगठन मंत्री, भारतीय इतिहास संकलन समिति, दिल्ली प्रांत) सहित मंत्री, प्रो. शिवकुमार मिश्रा, मुकेश उपाध्याय, डॉ. सौरभ मिश्र, डॉ. हर्षवर्धन सिंह तोमर, डॉ. राजवंती, प्रो. सुशांत बाग, डॉ. पीयूष मिश्र, आयुष द्विवेदी, कृष्णा द्विवेदी, डॉ. अमन पांडेय, डॉ. कुमार राकेश, डॉ. रीना कपूर और अनेक अन्य पदाधिकारीगण, आजीवन सदस्यों सहित सवा सौ से भी अधिक अतिथियों की उपस्थिति रही