जल संकट पर मंथन: विकसित भारत के लिए समग्र जल प्रबंधन पर राष्ट्रीय आह्वान

समग्र विकास न्यास द्वारा नई दिल्ली में आयोजित उच्च स्तरीय सम्मेलन, जल संकट से निपटने हेतु नीति, जनभागीदारी और संरक्षण पर जोर

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 20 मार्च:  सतत और सुदृढ़ विकसित भारत के निर्माण में जल प्रबंधन की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करते हुए “जल प्रबंधन – सतत एवं सुदृढ़ विकसित भारत का आधार” विषय पर एक उच्च स्तरीय सम्मेलन का आयोजन 16 मार्च को संविधान क्लब में किया गया। इस सम्मेलन में नीति-निर्माताओं, विषय विशेषज्ञों, मीडिया प्रतिनिधियों और विभिन्न हितधारकों ने भाग लेकर देश की जल चुनौतियों और उनके समाधान पर गंभीर विचार-विमर्श किया।

समग्र विकास न्यास द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में जल जीवन मिशन जैसी राष्ट्रीय पहलों के अनुरूप जल संरक्षण और जल शासन को सुदृढ़ करने पर विशेष बल दिया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और राष्ट्रगान के साथ हुआ।

प्रारंभिक संबोधन में पंचगव्य विद्यापीठम गुरुकुल विश्वविद्यालय, कांचीपुरम (तमिलनाडु) के मानद प्रति कुलपति डॉ. कुमार राकेश ने जल के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जल प्रबंधन की शुरुआत घर से होनी चाहिए और इसे खेतों तक विस्तारित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा, “घर से खेत तक जल ही जीवन और स्थिरता का आधार है।” उन्होंने जागरूकता, जिम्मेदार उपयोग और नीतिगत समर्थन के समन्वय पर बल देते हुए भविष्य की पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई। साथ ही उन्होंने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पंचगव्य और जल प्रबंधन के संबंध पर भी विचार साझा किए।

डॉ. राकेश ने कार्यक्रम में उपस्थित विशिष्ट अतिथियों का परिचय देते हुए उनके योगदानों को रेखांकित किया। उन्होंने केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री डॉ. राज भूषण चौधरी को राष्ट्रीय जल पहलों को दिशा देने वाला प्रमुख नीति-निर्माता बताया; राज्यसभा सदस्य भुवनेश्वर कलिता को पर्यावरणीय शासन का सशक्त स्वर; और वरिष्ठ सांसद एवं पूर्व रक्षा तथा पर्यटन राज्य मंत्री अजय भट्ट को सतत विकास के प्रबल समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया।

मुख्य अतिथि डॉ. राज भूषण चौधरी ने अपने संबोधन में कहा, “जल प्रबंधन केवल आवश्यकता नहीं, बल्कि सतत विकास की आधारशिला है। हमें उभरती पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए समन्वित रणनीतियां अपनानी होंगी।” उन्होंने सामुदायिक सहभागिता और नीतिगत तालमेल को दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताया। सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने दो घंटे से अधिक समय तक कार्यक्रम में उपस्थित रहकर सभी वक्ताओं के विचार सुने और महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपने सुझाव दिए।

राज्यसभा सदस्य एवं संसदीय स्थायी समिति (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन) के अध्यक्ष भुवनेश्वर कलिता ने कहा, “मजबूत नीतिगत ढांचा और प्रभावी प्रशासनिक तंत्र अत्यंत आवश्यक हैं। सतत जल प्रबंधन के लिए निरंतर नीतिगत नवाचार और वैज्ञानिक योजना जरूरी है।”

वरिष्ठ सांसद एवं पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री अजय भट्ट ने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा, “भारत की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियां हमें महत्वपूर्ण सीख देती हैं। इन्हें आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर व्यापक और टिकाऊ समाधान विकसित किए जा सकते हैं।” उन्होंने विशेष रूप से पर्वतीय राज्यों, विशेषकर उत्तराखंड में ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

मुख्य वक्ता के रूप में जल संरक्षण एवं नीति विशेषज्ञ राजेश कुमार पांडेय ने देश की जल स्थिति का विश्लेषण करते हुए कहा, “भारत जल संकट और कुप्रबंधन, दोनों चुनौतियों का सामना कर रहा है। वैश्विक अनुभव बताते हैं कि सफल जल प्रबंधन के लिए प्रभावी नीतियों का क्रियान्वयन और जनभागीदारी अत्यंत आवश्यक है।”

सम्मेलन में डॉ. उत्तम सिन्हा (रणनीतिक मामलों एवं जल नीति विशेषज्ञ), चित्तरंजन कुमार खेतान (भारतीय प्रशासनिक सेवा, सेवानिवृत्त) एवं पूर्व मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी, डॉ. उत्तम ओझा (पर्यावरण विशेषज्ञ एवं उत्तर प्रदेश राज्य समन्वयक) तथा माधवी अग्रवाल (पश्चिम बंगाल की प्रवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता) ने भी अपने विचार रखे। चित्तरंजन खेतान ने इंदौर में जल कुप्रबंधन से हुई दुखद घटनाओं का उल्लेख करते हुए नीतिगत सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। सभी वक्ताओं ने जल संरक्षण और प्रबंधन को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. नीरजा चतुर्वेदी ने प्रभावी ढंग से किया, जिससे पूरा सत्र सुव्यवस्थित और रोचक बना रहा।

समापन सत्र में समग्र विकास न्यास की निदेशक डॉ. पूनम शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “जल संरक्षण एक सामूहिक जिम्मेदारी है और ऐसे मंच विचारों को ठोस कार्यों में बदलने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।” उन्होंने सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए निरंतर संवाद और सहभागिता को आवश्यक बताया।

सम्मेलन का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि नवाचार, नीतिगत उपायों और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से जल प्रबंधन को सुदृढ़ कर एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण किया जाएगा।

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