आरएसएस ,रॉ पर निशाना ? यूएससीआईआरएफ रिपोर्ट पर भारत के सवाल

U.S. Commission on International Religious Freedom

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पूनम शर्मा
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि और आंतरिक मामलों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन हाल ही में U.S. Commission on International Religious Freedom की रिपोर्ट ने एक नई बहस को जन्म दिया है। इस रिपोर्ट में Rashtriya Swayamsevak Sangh और Research and Analysis Wing (रॉ) को लेकर जो टिप्पणियाँ की गई हैं, उन पर भारत सरकार ने कड़ा ऐतराज़ जताया है।
भारत का स्पष्ट कहना है कि यह रिपोर्ट न केवल तथ्यों से परे है, बल्कि इसमें इस्तेमाल किए गए स्रोत भी संदिग्ध हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों बार-बार भारत की प्रमुख संस्थाओं को निशाना बनाया जाता है?

यूएससीआईआरएफ एक अमेरिकी संस्था है, जिसका काम दुनियाभर में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर नजर रखना है। हालांकि, भारत लंबे समय से इस संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाता रहा है। ताज़ा रिपोर्ट में आरएसएस को लेकर जो टिप्पणियाँ की गई हैं, उन्हें भारत ने “पूर्वाग्रह से ग्रसित” बताया है।
आरएसएस, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जाता है, भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाता है। वहीं रॉ, देश की बाहरी खुफिया एजेंसी है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बेहद संवेदनशील मामलों को संभालती है। ऐसे में इन संस्थाओं पर बिना ठोस प्रमाण के आरोप लगाना भारत के लिए चिंता का विषय है।

भारत सरकार का मानना है कि यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट में एकतरफा दृष्टिकोण अपनाया गया है। इसमें भारत के अंदर कथित धार्मिक असहिष्णुता की घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है, जबकि अमेरिका और अन्य देशों में हिंदुओं के खिलाफ हो रही घटनाओं को नजरअंदाज किया गया है।

हाल के वर्षों में अमेरिका में हिंदू मंदिरों पर हमले, तोड़फोड़ और हिंदू समुदाय के खिलाफ बढ़ती नफरत के कई मामले सामने आए हैं। भारत का कहना है कि यदि धार्मिक स्वतंत्रता पर रिपोर्ट तैयार की जाती है, तो उसमें इन घटनाओं को भी समान महत्व मिलना चाहिए। लेकिन यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट में इन मुद्दों को अपेक्षित जगह नहीं दी गई।

यह भी सवाल उठता है कि रिपोर्ट के लिए किन स्रोतों का इस्तेमाल किया गया है। भारत का आरोप है कि कई ऐसे संगठनों और व्यक्तियों के बयानों को आधार बनाया गया है, जिनका अपना एक विशेष एजेंडा है। इससे रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
भारत की विदेश नीति हमेशा से “आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं” के सिद्धांत पर आधारित रही है। ऐसे में किसी विदेशी संस्था द्वारा भारत की संस्थाओं और सामाजिक ढांचे पर टिप्पणी करना स्वाभाविक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की रिपोर्टें अक्सर भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी प्रभावित होती हैं। भारत आज वैश्विक मंच पर एक मजबूत शक्ति के रूप में उभर रहा है, और उसकी बढ़ती भूमिका कुछ देशों को असहज कर सकती है।

हालांकि, यह भी सच है कि लोकतंत्र में आलोचना का अपना स्थान होता है। लेकिन यह आलोचना तथ्यों और संतुलन पर आधारित होनी चाहिए। एकतरफा रिपोर्टें न केवल गलत संदेश देती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी प्रभावित कर सकती हैं।
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी संप्रभुता और संस्थाओं की गरिमा से किसी तरह का समझौता नहीं करेगा। साथ ही, उसने यह भी संकेत दिया है कि ऐसे मामलों में तथ्यात्मक और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना ही सही रास्ता है।
अंततः यह मामला केवल एक रिपोर्ट का नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी संकेत है कि वैश्विक स्तर पर भारत को लेकर किस तरह की धारणा बनाई जा रही है। ऐसे में जरूरी है कि हर रिपोर्ट को तथ्यों की कसौटी पर परखा जाए और निष्पक्षता को सर्वोपरि रखा जाए।

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