पूनम शर्मा
दो नम आंखें, होंठों पर अधूरी सी कोई बात… जैसे शब्द गले में ही अटक गए हों। हरीश राणा के जीवन के अंतिम क्षणों ने पूरे देश को भीतर तक झकझोर दिया। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं रही, बल्कि एक ऐसी संवेदनशील घटना बन गई, जिसने इंसानियत, पीड़ा और अधिकारों पर गहरी सोचने को मजबूर कर दिया।
भारत ने एक ऐतिहासिक पल का साक्षी बना, जब गाजियाबाद निवासी हरीश राणा को “पैसिव यूथेनेशिया” यानी परोक्ष स्वेच्छामृत्यु का अधिकार मिला। वे इस अधिकार को पाने वाले देश के पहले व्यक्ति बन गए। यह निर्णय जितना कानूनी था, उतना ही भावनात्मक भी।
पिछले 13 वर्षों से हरीश कोमा में थे। एक लंबी और कठिन जंग, जिसमें न तो वे पूरी तरह जीवित जीवन जी पा रहे थे, और न ही मृत्यु उन्हें अपने पास बुला पा रही थी। उनका शरीर मशीनों के सहारे चल रहा था, लेकिन जीवन की वह ऊर्जा, वह संवाद, वह अभिव्यक्ति कहीं खो चुकी थी।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ उनका अंतिम 21 सेकंड का वीडियो लोगों के दिलों को छू गया। वीडियो में हरीश अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए दिखाई देते हैं। उनकी आंखों में आंसू हैं, जैसे वे बहुत कुछ कहना चाहते हों। उनके होंठ हल्के-हल्के कांपते हैं, लेकिन शब्द बाहर नहीं आ पाते। उस क्षण में उनकी आंखें ही उनकी भाषा बन जाती हैं—एक ऐसी भाषा, जो हर देखने वाले के दिल तक सीधे पहुंचती है।
उनके चारों ओर परिवार के लोग खड़े थे। हर चेहरा भावनाओं से भरा हुआ, हर आंख नम। उस माहौल में एक अजीब सी खामोशी थी—एक ऐसी खामोशी, जिसमें दर्द भी था, प्रेम भी और विदाई की भारी अनुभूति भी।
सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया, जब उनकी बहन ने उनके माथे पर चंदन का तिलक लगाया। कांपती आवाज़ में उसने कहा—“सबको माफ कर दो और सबसे माफी मांगकर विदा लो।” यह शब्द सिर्फ एक रस्म नहीं थे, बल्कि उस रिश्ते की गहराई को दर्शा रहे थे, जो हर परिस्थिति में साथ खड़ा रहता है।
स्वेच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के बाद हरीश को दिल्ली के AIIMS अस्पताल में स्थानांतरित किया गया। वहां डॉक्टरों की एक टीम की निगरानी में उनके शरीर से धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया गया। यह प्रक्रिया किसी तकनीकी कार्य से अधिक एक भावनात्मक यात्रा थी—जहां हर पल एक जीवन के समाप्त होने की ओर बढ़ रहा था।
और फिर… वह अंतिम क्षण आया। मशीनों की आवाज़ें धीमी होती गईं, और अंततः सब कुछ शांत हो गया। हरीश राणा इस दुनिया को अलविदा कह गए—एक ऐसी खामोशी के साथ, जो बहुत कुछ कह गई।
उनकी कहानी कई सवाल छोड़ जाती है। क्या जीवन सिर्फ सांसों का नाम है? क्या किसी व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपनी असहनीय पीड़ा से मुक्ति चुन सके? और सबसे अहम—क्या हम ऐसे फैसलों को सिर्फ कानून के दायरे में देख सकते हैं, या इसमें भावनाओं की भी बराबर भूमिका होती है?
हरीश शायद बहुत कुछ कहना चाहते थे—अपने परिवार से, इस दुनिया से, शायद खुद से भी। लेकिन उनके शब्द अधूरे रह गए। फिर भी, उनकी आंखों ने जो कहा, वह किसी भी भाषा से अधिक गहरा था।
उनकी विदाई ने यह सिखाया कि जीवन कितना अनमोल है, और साथ ही यह भी कि पीड़ा की भी एक सीमा होती है। कभी-कभी, सबसे कठिन निर्णय ही सबसे मानवीय होते हैं।
हरीश राणा अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी, उनके अंतिम क्षण और उनकी खामोश आंखों की भाषा हमेशा याद रखी जाएगी—एक ऐसी कहानी के रूप में, जिसने पूरे देश को भावुक कर दिया।