सुप्रीम कोर्ट : प्रथम बार पैसिव यूथेनेशिया को अनुमति

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली 12 मार्च:भारत में जीवन और मृत्यु के अधिकार से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में Supreme Court of India ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने पहली बार पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति देते हुए 13 साल से स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में पड़े एक युवक का लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाजत दी है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि प्रक्रिया पूरी तरह गरिमापूर्ण तरीके से की जाए, ताकि मरीज की मानव गरिमा बनी रहे।

न्यायमूर्ति JB Pardiwala और न्यायमूर्ति KV Viswanathan की पीठ ने 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में यह फैसला सुनाया। हरीश राणा 13 साल पहले एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिसके बाद उन्हें गंभीर मस्तिष्क चोट लगी और वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में चले गए।

अदालत के अनुसार, पिछले 13 वर्षों में उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और वह पूरी तरह चिकित्सकीय पोषण (Clinically Administered Nutrition) पर निर्भर हैं, जो उनके शरीर में सर्जरी से लगाए गए ट्यूब के माध्यम से दिया जा रहा था।

अदालत ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मरीज के इलाज से कोई चिकित्सकीय सुधार संभव नहीं है और केवल जैविक अस्तित्व ही बनाए रखा जा रहा है, तो ऐसी स्थिति में इलाज जारी रखना मरीज के सर्वोत्तम हित में नहीं माना जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि चिकित्सकीय पोषण भी एक तरह का मेडिकल ट्रीटमेंट है और इसे प्राथमिक व द्वितीयक मेडिकल बोर्ड की सिफारिश के आधार पर हटाया जा सकता है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि हरीश राणा के माता-पिता और दोनों मेडिकल बोर्ड इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मरीज के लिए लाइफ सपोर्ट हटाना ही बेहतर है। ऐसे में अदालत ने इसे मंजूरी दी।

एम्स में होगी प्रक्रिया

अदालत ने निर्देश दिया कि हरीश राणा को All India Institute of Medical Sciences के पेलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती कराया जाए। वहीं चिकित्सकीय निगरानी में उनका लाइफ सपोर्ट धीरे-धीरे हटाया जाएगा।

साथ ही अदालत ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मरीज की गरिमा और मानवीय सम्मान को बनाए रखने के लिए विशेष योजना तैयार की जाए।

हाई कोर्ट और सरकार को भी निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने राज्यों के न्यायिक मजिस्ट्रेटों को ऐसे मामलों की सूचना प्राप्त करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करें।

इसके अलावा केंद्र सरकार को आदेश दिया गया कि प्रत्येक जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ऐसे मामलों के लिए योग्य डॉक्टरों का पैनल तैयार रखें, ताकि मेडिकल बोर्ड का गठन आसानी से हो सके।

2018 के फैसले पर आधारित निर्णय

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 2018 के ऐतिहासिक Common Cause v. Union of India निर्णय पर आधारित है, जिसमें अदालत ने “गरिमा के साथ मरने के अधिकार” को मौलिक अधिकार माना था। 2023 में इन दिशानिर्देशों को और स्पष्ट किया गया था।

हालांकि, अब तक इन दिशानिर्देशों का किसी मामले में प्रत्यक्ष रूप से उपयोग नहीं हुआ था। हरीश राणा का मामला पहला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के इन सिद्धांतों को लागू किया गया।

फैसले में न्यायमूर्ति पारदीवाला ने हरीश राणा के माता-पिता की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने बेटे का साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा कि सच्चा प्रेम वही है जो सबसे कठिन समय में भी साथ निभाता है।

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
Leave A Reply

Your email address will not be published.