पूनम शर्मा
दुनिया के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो दशकों पुराने ढांचों को हिलाकर रख देते हैं। वर्ष 2026 का यह समय बिल्कुल वैसा ही है। 28 फरवरी को ईरान पर हुए भीषण हमले और ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या ने पश्चिम एशिया को बारूद के ढेर पर लाकर खड़ा कर दिया है। लेकिन इस युद्ध से भी बड़ी एक और घटना घट रही है—वह है 1945 में बनी उस विश्व व्यवस्था का अंत, जिसका नेतृत्व और पोषण अमेरिका ने किया था।
टूटी हुई पुरानी व्यवस्था और अमेरिका का बदलता रुख
पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने दुनिया को झकझोर दिया है। सबसे पहले, अमेरिकी विशेष बलों ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके घर से किडनैप कर न्यूयॉर्क पहुँचा दिया। इसके तुरंत बाद, बिना किसी चेतावनी या संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के ईरान पर हमला कर दिया गया। ये दोनों ही कार्रवाइयां अंतरराष्ट्रीय कानून की धज्जियां उड़ाती हैं।
इतना ही नहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को बाहर निकाल लिया है। इनमें से 31 तो केवल संयुक्त राष्ट्र की इकाइयां हैं। ट्रंप अब ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) नामक एक नई संस्था बना रहे हैं, जिसकी अध्यक्षता वे खुद करेंगे। यह स्पष्ट संदेश है: अमेरिका अब उस वैश्विक व्यवस्था का हिस्सा नहीं रहना चाहता जिसे उसने खुद बनाया था। अब वह अपनी शर्तों पर नई दुनिया बनाना चाहता है।
अमेरिका पर निर्भरता: एक पुरानी और खतरनाक आदत
पिछले 80 सालों से, दुनिया ने बहुपक्षवाद (Multilateralism) का लाभ उठाया, लेकिन उसका सारा आर्थिक और सैन्य बोझ अमेरिका ने उठाया। यूरोप अमेरिकी सुरक्षा की छत्रछाया में सुरक्षित रहा, जबकि बाकी दुनिया अमेरिकी फंड के भरोसे अपनी योजनाएं बनाती रही। लेकिन 2026 की दुनिया 1945 जैसी नहीं है। आज चीन एक आर्थिक महाशक्ति है, भारत, इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे देश वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना चुके हैं, और खाड़ी देश आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध हैं।
रॉबिन्सन का तर्क है कि अब अमेरिका पर दोष मढ़ने का समय खत्म हो चुका है। यदि अमेरिका पीछे हट रहा है, तो बाकी दुनिया क्या कर रही है? क्या हम केवल आलोचना करेंगे या इस व्यवस्था को बचाने के लिए अपने संसाधन झोंकेंगे?
भविष्य के लिए क्रांतिकारी सुझाव:
मुख्यालय का स्थानांतरण: संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय न्यूयॉर्क में क्यों होना चाहिए? जब मेजबान देश ही इस संस्था के अस्तित्व को नकार रहा हो और उसके फंड काट रहा हो, तो मुख्यालय को जिनेवा, नैरोबी या रियो डी जनेरियो जैसे शहरों में ले जाना चाहिए। मॉरीशस या बारबाडोस जैसे छोटे द्वीप राष्ट्र भी एक बेहतरीन विकल्प हो सकते हैं। इससे यह संदेश जाएगा कि अब यह संस्था केवल ताकतवर देशों की जागीर नहीं, बल्कि ‘कमजोर और जरूरतमंद देशों’ की आवाज है।
फंडिंग का नया लोकतांत्रिक ढांचा: वर्तमान में यूएन के बजट का लगभग 22% हिस्सा अकेले अमेरिका देता है। इसी आर्थिक ताकत के दम पर वाशिंगटन पूरी संस्था को अपनी उंगलियों पर नचाता है। यदि यूरोपीय संघ, चीन, जापान और समृद्ध खाड़ी देश अपनी आर्थिक जिम्मेदारी बढ़ाते हैं, तो यूएन को एक निष्पक्ष और पारदर्शी स्वरूप दिया जा सकता है।
जलवायु और सुरक्षा की नई रणनीति: गाजा, सूडान और कांगो में जारी मानवीय संकटों के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पंगु नजर आती है। वीटो पावर के दुरुपयोग ने इसे बेअसर कर दिया है। इसके अलावा, अमेरिका के हटने से ‘ग्रीन क्लाइमेट फंड’ जैसे महत्वपूर्ण मिशन खतरे में हैं। छोटे द्वीप राष्ट्रों (SIDS) के लिए यह केवल राजनीति नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व की लड़ाई है।
निष्कर्ष: वैश्विक नेतृत्व का नया उदय
कैरिबियन देशों से लेकर अफ्रीका और एशिया तक, अब समय आ गया है कि हम अपनी ‘नैतिक शक्ति’ को पहचानें। यदि दुनिया युद्धों के लिए रातों-रात खरबों डॉलर जुटा सकती है, तो वह एक नए, स्वतंत्र और मजबूत संयुक्त राष्ट्र के लिए भी संसाधन जुटा सकती है।
1945 में युद्ध से थके हुए अमेरिका ने दुनिया को जोड़ने का फैसला किया था। 2026 में उसी अमेरिका ने अपना रास्ता अलग करने का फैसला किया है। हमें इस बदलाव को बिना किसी कड़वाहट के स्वीकार करना चाहिए और इसे एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में देखना चाहिए—एक ऐसा अवसर जहाँ दुनिया किसी एक देश के इशारों पर नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग से चले।