पूनम शर्मा
आज की दुनिया में सरहदे सिर्फ नक्शों पर रह गई हैं, क्योंकि विचारधाराओं और कट्टरपंथ की जंग अब सात समंदर पार तक फैल चुकी है। हाल ही में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खमेनी और उनके नेटवर्क के खिलाफ जो इजरायली और अमेरिकी कार्रवाई देखने को मिली है, उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात तेहरान या सीरिया की गलियों से नहीं, बल्कि भारत के राजनीतिक और बौद्धिक हलकों से निकलकर आ रही है।
तेहरान में जश्न, तो भारत में मातम क्यों?
ईरान के भीतर की तस्वीरों ने दुनिया को हैरान कर दिया। जहाँ हिजाब विरोधी आंदोलनों से जुड़ी महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर खमेनी के अंत का मजाक उड़ाया और आजादी का जश्न मनाया, वहीं भारत के कुछ हिस्सों—चाहे वो कश्मीर की गलियां हों, यूपी के कुछ इलाके हों या फिर लुटियंस दिल्ली के आलीशान बंगले—वहाँ एक अजीब सी खामोशी और मातम पसरा नजर आया।
सवाल यह उठता है कि जिस शख्स ने अपने ही देश की महिलाओं और युवाओं पर जुल्म ढाए, उसके खत्म होने पर भारत के ‘लिबरल’ और कुछ खास राजनीतिक दल इतने दुखी क्यों हैं? क्या वाकई खमेनी का ‘असली हेडक्वार्टर’ मिडिल ईस्ट में नहीं, बल्कि दिल्ली के 10 जनपथ जैसे ठिकानों पर था?
10 जनपथ और ‘चूड़ियाँ टूटने’ का शोर
सोशल मीडिया पर इन दिनों एक तीखा मुहावरा चल रहा है—”कसम मर जाना”। जब किसी का रक्षक या वैचारिक आका खत्म होता है, तो दर्द गहरा होता है। आरोप लग रहे हैं कि जिस दिन खमेनी के अंडरग्राउंड ठिकानों और भारी हथियारों को इजरायली बमों ने धुआं कर दिया, उस दिन भारत की सबसे पुरानी पार्टी के मुख्यालय में जैसे मातम छा गया। सोनिया गांधी और राहुल गांधी की खामोशी पर सवाल उठ रहे हैं। क्या ये वही ‘सिम्पैथी’ है जो गाजा और लेबनान के आतंकियों के लिए अक्सर दिखाई जाती है?
इतना ही नहीं, बिहार से लेकर केरल तक के नेता, जैसे तेजस्वी यादव, जो खमेनी जैसे कट्टरपंथियों को ‘भाई’ की तरह देखते हैं, आज खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं। ये लोग शायद भूल गए हैं कि इजरायल और अब फिर से चर्चा में आए डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कह दिया है: “जहाँ भी खमेनी की फैमिली या उसके विचारधारा के समर्थक मिलेंगे, हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे।”
स्वच्छ भारत अभियान का ‘नया फेज’
प्रधानमंत्री मोदी का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ अक्सर गलियों की सफाई से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन जानकारों का मानना है कि अब इसका एक ‘रणनीतिक फेज’ (Strategic Phase) शुरू होने वाला है। यह सफाई कूड़े-कचरे की नहीं, बल्कि देश के भीतर छिपे उन ‘स्लीपर सेल्स’ और कट्टरपंथियों की होगी जो भारत में रहकर दूसरे देशों के आतंकियों के लिए आंसू बहाते हैं।
तीन चरणों का कथित ‘क्लीनर ऑपरेशन’:
पहला चरण (आउटसोर्सिंग): कहा जा रहा है कि भारत सरकार उन तमाम रेडिकलाइज्ड लोगों की लिस्ट और जीपीएस (GPS) को-ऑर्डिनेट्स इजरायल और अमेरिका के साथ साझा कर सकती है, जो ग्लोबल टेरर नेटवर्क का हिस्सा हैं। अगर ट्रंप और नेतन्याहू ने ठान लिया है, तो फिर आसमान से आने वाले सटीक ‘तोहफों’ (Precision Bombs) से बचना नामुमकिन होगा।
दूसरा चरण (अननोन गनमैन): पिछले कुछ सालों में हमने देखा है कि कैसे भारत के दुश्मन विदेशों में ‘अज्ञात हमलावरों’ का शिकार हो रहे हैं। अब यही
‘फ्रैंचाइजी’ भारत के भीतर उन लोगों के खिलाफ भी सक्रिय हो सकती है जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
तीसरा चरण (जन-भागीदारी): जब सरकार ट्रेनिंग और माहौल तैयार कर देती है, तो सफाई का काम जनता के हाथ में आ जाता है। बॉर्डर स्टेट्स और संवेदनशील इलाकों में अब लोग जागरूक हो रहे हैं। वे अब उन ‘घुसपैठियों’ और ‘जिहादियों’ को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं, जिन्होंने दशकों से भारत की जनसांख्यिकी (Demography) को बदलने की कोशिश की है।
बॉलीवुड और मीडिया का गिरता नकाब
बॉलीवुड का एक खास हिस्सा, जो खुद को बहुत ‘लिबरल’ कहता है, आज खमेनी के लिए शोक मना रहा है। उनके लिए मानवाधिकार तभी याद आते हैं जब किसी आतंकी पर कार्रवाई होती है। लेकिन जब वही आतंकी निर्दोष हिंदुओं या आम नागरिकों को निशाना बनाते हैं, तो इनके होंठ सिल जाते हैं। डोनाल्ड ट्रंप की नजर इन ‘सफेदपोश’ समर्थकों पर भी है।
निष्कर्ष: अंत की शुरुआत
जो लोग आज भी ‘ज़मीन हमारी है’ के नारे लगा रहे हैं और 40% आबादी होने पर देश पर कब्जे के सपने देख रहे हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि वक्त बदल चुका है। इजरायल के पेजर धमाकों ने दिखा दिया है कि तकनीक और इच्छाशक्ति मिलकर किसी भी नेटवर्क को मिनटों में तबाह कर सकती है।
खमेनी का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का अंत नहीं है, बल्कि उस विचारधारा के पतन की शुरुआत है जिसने भारत और दुनिया को कट्टरपंथ की आग में झोंकने की कोशिश की। अब देखना यह है कि क्या भारत के ‘सिम्पैथाइजर्स’ अपनी राह बदलेंगे या फिर ‘स्वच्छ भारत’ के अगले फेज का शिकार बनेंगे।