ईरान युद्ध: रूस के लिए क्यों बन सकता है बड़ा रणनीतिक फायदा?

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पूनम शर्मा
मध्य पूर्व में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों ने वैश्विक राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या के बाद स्थिति और भी विस्फोटक हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम ने दुनिया की कई बड़ी शक्तियों को असहज कर दिया है, लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इससे रूस को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिल सकता है।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए यह संघर्ष केवल मध्य पूर्व का संकट नहीं है, बल्कि एक ऐसा भू-राजनीतिक मोड़ है जो यूक्रेन युद्ध में रूस की स्थिति को मजबूत कर सकता है।

तेल और गैस की कीमतों में उछाल से रूस को फायदा

सबसे बड़ा फायदा ऊर्जा बाजार से जुड़ा हुआ है। जैसे ही ईरान पर हमले शुरू हुए, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों में तेजी देखी गई। रूस दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा निर्यातकों में से एक है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी सीधे उसके खजाने को भर सकती है।

यूरोप पहले से ही रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। यदि मध्य पूर्व में युद्ध लंबा चलता है, तो ऊर्जा की कीमतें और बढ़ सकती हैं। इसका असर यह होगा कि यूरोपीय देशों के लिए यूक्रेन की आर्थिक और सैन्य मदद जारी रखना और मुश्किल हो जाएगा।

अमेरिका का ध्यान बंटना

मध्य पूर्व में बढ़ता संघर्ष अमेरिका के रणनीतिक फोकस को भी बदल सकता है। अभी तक अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की बड़ी प्राथमिकता यूक्रेन को रूस के खिलाफ समर्थन देना रही है।

लेकिन अगर अमेरिका को ईरान के साथ लंबे युद्ध में उलझना पड़ता है, तो उसके सैन्य संसाधन और हथियारों का बड़ा हिस्सा उसी दिशा में चला जाएगा। इससे यूक्रेन को मिलने वाली सैन्य सहायता में कमी आ सकती है, खासकर एयर डिफेंस मिसाइलों और आधुनिक हथियारों की आपूर्ति में।

यह स्थिति रूस के लिए युद्ध के मैदान में एक बड़ी राहत बन सकती है।

यूक्रेन युद्ध में रूस की रणनीतिक बढ़त

रूस पहले ही चार साल से यूक्रेन में युद्ध लड़ रहा है। इस दौरान उसने अपनी सैन्य तकनीक और रणनीति में काफी बदलाव किया है। अगर अमेरिका का ध्यान मध्य पूर्व की ओर जाता है, तो रूस को यूक्रेन में अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिल सकता है।

इसके अलावा, अमेरिका और यूरोप के बीच भी रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर मतभेद पैदा हो सकते हैं। यह भी रूस के लिए फायदेमंद स्थिति हो सकती है।

घरेलू राजनीति में भी फायदा

मध्य पूर्व में युद्ध की तस्वीरें और अस्थिरता रूस के भीतर भी एक खास राजनीतिक माहौल बना सकती हैं। रूसी सरकार लंबे समय से यह दावा करती रही है कि पश्चिमी देश दुनिया में अराजकता फैलाते हैं और शासन परिवर्तन की नीति अपनाते हैं।

ईरान में हो रही घटनाएं इस नैरेटिव को रूस के अंदर और मजबूत कर सकती हैं। इससे **Vladimir Putin** की छवि एक ऐसे नेता के रूप में मजबूत हो सकती है जो देश को बाहरी खतरों से बचा रहा है।

 रूस की सीमित भूमिका

हालांकि ईरान और रूस के बीच पिछले कुछ वर्षों में संबंध बेहतर हुए हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रूस सीधे इस युद्ध में कूद जाएगा।

रूस के इज़राइल के साथ भी व्यावहारिक संबंध हैं। इसके अलावा, रूस अभी यूक्रेन युद्ध में ही अपनी सैन्य क्षमता का बड़ा हिस्सा लगा चुका है। इसलिए वह इस संघर्ष में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचना चाहेगा।

इतिहास से जुड़ा रूस का नजरिया

रूस के दृष्टिकोण को समझने के लिए 2011 की घटना को भी देखना जरूरी है, जब गद्दाफ़ी  की सरकार को गिराने के लिए नाटो  ने लीबिया में हस्तक्षेप किया था। उस समय रूस ने संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव का विरोध नहीं किया था, लेकिन बाद में यह फैसला मास्को को भारी पड़ा।

उसके बाद से रूस पश्चिमी देशों की सैन्य कार्रवाइयों को बेहद संदेह की नजर से देखता है। यही सोच बाद में यूक्रेन में उसकी आक्रामक नीति का आधार बनी।

आगे क्या हो सकता है?

यदि अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच संघर्ष लंबा चलता है, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। यह वैश्विक शक्ति संतुलन को भी बदल सकता है।

रूस के लिए यह स्थिति एक अवसर बन सकती है—ऊर्जा से ज्यादा कमाई, यूक्रेन में रणनीतिक बढ़त और घरेलू राजनीतिक मजबूती।

हालांकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में परिस्थितियां बहुत तेजी से बदलती हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह संघर्ष आखिरकार किसे कितना फायदा पहुंचाएगा।

लेकिन इतना तय है कि मध्य पूर्व की यह आग अब वैश्विक भू-राजनीति को भी प्रभावित करने लगी है।

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