ईरान में आयतुल्लाह खामेनेई की हत्या के बाद क्या सत्ता परिवर्तन होगा?

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पूनम शर्मा 

जब भी कोई बड़ा नेता मारा जाता है, दुनिया को लगता है कि अब सब बदल जाएगा। अमेरिका और इज़राइल ने जब ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई और कई अन्य बड़े अधिकारियों की हत्या कर दी, तो वॉशिंगटन और तेल अवीव में जश्न मना गया। डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरानी जनता से “उठ खड़े होने” की अपील की। लेकिन सवाल ये है — क्या सच में ऐसा होगा? क्या एक नेता की मौत से पूरा तंत्र बिखर जाएगा?

अगर इतिहास से कुछ सीखना है, तो जवाब है — शायद नहीं। बल्कि हालात और भी बदतर हो सकते हैं।

अफगानिस्तान, इराक और लीबिया से सबक

ये बात कोई नई नहीं है। मध्य पूर्व मे पहले भी बाहरी ताकतों ने “सत्ता परिवर्तन” का दावा करते हुए सैनिक हस्तक्षेप किया है। नतीजा? अफगानिस्तान में 2001 में अमेरिकी हमले के बाद बीस साल तक लड़ाई चली। 2021 में तालिबान वापस आ गया। वहां आज भी स्थिरता एक सपना है।

इराक में 2003 में सद्दाम हुसैन को हटाया गया। उसके बाद जो हुआ वो हम सबने देखा — गृहयुद्ध, आईएसआईएस का उदय, लाखों लोगों की मौत। आज दो दशक बाद भी इराक पूरी तरह खड़ा नहीं हो पाया।

लीबिया में 2011 में नाटो ने हस्तक्षेप किया। गद्दाफी मारे गए। लेकिन देश दो टुकड़ों में बंट गया — त्रिपोल और बेनगाज़ी। आज तक एकता नहीं आई।

इन तीनों देशों में एक बात समान है — बाहरी हस्तक्षेप के बाद “तेज़ स्थिरता” कभी नहीं आई। जो आया वो था लंबा दर्द, अनिश्चितता और टूटन।

ईरान अलग है, लेकिन खतरे भी अलग हैं

ईरान की स्थिति अफगानिस्तान या लीबिया से बिल्कुल अलग है। यहां का तंत्र कहीं ज़्यादा गहरा और जटिल है। शिया इस्लाम में शहादत का एक ख़ास मतलब होता है। खामेनेई को दुश्मनों ने मारा — इस बात को ईरानी सत्ता बहुत आसानी से “शहादत” के रूप में पेश कर सकती है। और ये कोई छोटी बात नहीं।

जब कोई नेता “शहीद” बन जाता है, तो वो हारा हुआ नहीं माना जाता। उसकी मौत लोगों को एकजुट करती है। यहां तक कि जो लोग पहले सरकारके ख़िलाफ़ थे, वो भी “विदेशी हमले” के ख़िलाफ़ एक हो सकते हैं। ये राष्ट्रवाद की लहर बहुत ताकतवर हो सकती है।

हां, जनवरी के विरोध प्रदर्शनों पर हुई खूनी कार्रवाई ने जनता और सत्ता के बीच दरार गहरी कर दी है। लेकिन बाहरी हमला इस दरार को और चौड़ा करने की बजाय पाट भी सकता है — कम से कम कुछ समय के लिए।

असली सवाल: तंत्र टिकेगा या बिखरेगा?

ईरान का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वहां का “डीप स्टेट” — यानी नौकरशाही, केंद्रीय बैंक, मंत्रालय, और क्षेत्रीय प्रशासन — काम करता रहेगा या नहीं। अगर ये संस्थाएं चलती रहीं, तो ईरान लीबिया जैसी तबाही से बच सकता है।

लेकिन अगर सेना (आर्तेश) और रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) में आपसी टकराव शुरू हो गया, तो बात बिगड़ सकती है कोई भी नया नेता — चाहे वो गालिबाफ हों, रूहानी हों या लारिजानी — खामेनेई जैसा आध्यात्मिक अधिकार नहीं रखते। बिना इस अधिकार के, सत्ता पर पकड़ बनाना बेहद मुश्किल होगा।

मध्यम वर्ग खत्म, खतरा बढ़ा

पश्चिमी प्रतिबंधों ने ईरान के मध्यम वर्ग को तबाह कर दिया है। और किसी भी राजनीतिक बदलाव में मध्यम वर्ग ही स्थिरता का सबसे बड़ा आधार होता है। जब ये वर्ग कमज़ोर हो, तो सत्ता का खालीपन हथियारबंद गुटों या कट्टरपंथी ताकतों से भरता है।

IRGC और बसीज के कट्टर तत्व “शांतिपूर्ण विलय” नहीं करेंगे, जैसा ट्रंप प्रशासन उम्मीद कर रहा है। ये लोग छापामार युद्ध में उतर सकते हैं — देश के बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकते हैं।

जातीय विविधता: एक और बारूद का ढेर

ईरान में बलूच, कुर्द, अरब और अन्य जातीय समूह हैं जिनकी शिकायतें पुरानी हैं। केंद्रीय सत्ता कमज़ोर होते ही ये आंदोलन अलगाववादी संघर्ष में बदल सकते हैं। बड़े शहरों में स्थानीय मिलिशिया सड़कों पर उतर सकती हैं। और सत्ता के लिए एलीट वर्ग की आपसी लड़ाई पूरे तंत्र को युद्धक्षेत्र बना सकती है।

कड़वा अंत” या “अंतहीन कड़वाहट”?

कुछ लोग कह रहे हैं कि “एक कड़वा अंत अंतहीन कड़वाहट से बेहतर है।” सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन इराक, अफगानिस्तान और लीबिया बताते हैं कि ये “कड़वा अंत” असल में एक नई और लंबी कड़वाहट की शुरुआत होता है।

ईरान की जनता पहले ही दशकों से दर्द झेल रही है — प्रतिबंधों का, दमन का, आर्थिक तबाही का। अब उन्हें युद्ध का दर्द भी सहना पड़ रहा है। और अगर ये हस्तक्षेप वैसे ही नतीजे लाता है जैसे पहले लाया है, तो ये दर्द दशकों तक और चलेगा।

खामेनेई का जाना एक युग का अंत ज़रूर है। लेकिन ये अंत नहीं, बल्कि एक नए और शायद ज़्यादा खतरनाक अध्याय की शुरुआत हो सकती है। सवाल ये नहीं कि ईरान बदलेगा नहीं — सवाल ये है कि ये बदलाव किसकी कीमत पर आएगा। और इतिहास बताता है कि सबसे ज़्यादा कीमत हमेशा आम लोग चुकाते हैं।

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