पूनम शर्मा
हाल ही में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच एक बड़ी सैन्य घटना ने दुनिया का ध्यान समुद्री युद्ध की ओर खींच लिया। अमेरिकी नौसेना की एक पनडुब्बी ने ईरान के युद्धपोत IRIS Dena को टॉरपीडो से डुबो दिया। यह घटना इसलिए भी खास है क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बहुत कम मौकों पर किसी जहाज को पनडुब्बी से दागे गए टॉरपीडो से डुबोया गया है।
अमेरिकी पनडुब्बी ने इस हमले में Mark 48 torpedo का इस्तेमाल किया, जो दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री हथियारों में से एक माना जाता है। इस घटना के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर टॉरपीडो क्या होता है, इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है और क्या भारत के पास भी ऐसे घातक हथियार मौजूद हैं।
टॉरपीडो क्या होता है?
टॉरपीडो मूल रूप से एक स्वचालित (self-propelled) पानी के अंदर चलने वाला विस्फोटक हथियार होता है। इसे पानी के ऊपर से या पानी के नीचे से छोड़ा जा सकता है। यह लक्ष्य की ओर खुद चलता है और जहाज या पनडुब्बी के पास पहुंचते ही विस्फोट कर देता है।
टॉरपीडो का मुख्य उद्देश्य दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों को भारी नुकसान पहुंचाना या उन्हें डुबो देना होता है। आमतौर पर टॉरपीडो दो प्रकार के होते हैं:
1. लाइटवेट टॉरपीडो – छोटे जहाजों और विमानों द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं
2. हेवीवेट टॉरपीडो – पनडुब्बियों और बड़े युद्धपोतों द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं
आधुनिक टॉरपीडो अत्याधुनिक तकनीक से लैस होते हैं। इनमें **सोनार आधारित अकॉस्टिक होमिंग सिस्टम** होता है, जो दुश्मन जहाज की आवाज या कंपन को पहचानकर सीधे उसकी ओर बढ़ता है। कई टॉरपीडो वायर गाइडेंस से भी नियंत्रित किए जा सकते हैं।
टॉरपीडो का इतिहास
टॉरपीडो का विकास 19वीं सदी के अंत में ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य में हुआ था। उस समय इनका इस्तेमाल छोटे और तेज जहाजों पर किया जाता था, ताकि वे बड़े और भारी युद्धपोतों को चुनौती दे सकें।
समय के साथ यह तकनीक दुनिया भर की नौसेनाओं में फैल गई और टॉरपीडो समुद्री युद्ध का अहम हथियार बन गया।
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में टॉरपीडो की भूमिका
टॉरपीडो का पहला बड़े पैमाने पर इस्तेमाल World War के दौरान हुआ। जर्मनी की पनडुब्बियों, जिन्हें U-boats कहा जाता था, ने ब्रिटेन जाने वाले व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाने के लिए टॉरपीडो का इस्तेमाल किया।
लेकिन टॉरपीडो का सबसे व्यापक उपयोग World War II में हुआ। इस दौरान लगभग सभी बड़े देशों की नौसेनाओं ने अपने जहाजों, पनडुब्बियों और विमानों को टॉरपीडो से लैस किया था।
अटलांटिक महासागर में जर्मन U-boats ने मित्र देशों के हजारों व्यापारिक जहाजों को डुबो दिया। वहीं प्रशांत महासागर में जापान ने अमेरिकी नौसेना के खिलाफ टॉरपीडो का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया।
1941 में Attack on Pearl Harbor के दौरान जापानी विमानों ने अमेरिकी जहाजों पर एयर-ड्रॉप टॉरपीडो से हमला किया था, जिससे अमेरिकी बेड़े को भारी नुकसान हुआ।
आधुनिक नौसेनाओं में टॉरपीडो की भूमिका
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद टॉरपीडो का इस्तेमाल कम जरूर हुआ है, लेकिन उनकी ताकत आज भी कम नहीं हुई। आज के समय में अधिकतर नौसेनाएं लंबी दूरी की एंटी-शिप मिसाइलों का इस्तेमाल करती हैं क्योंकि वे ज्यादा तेज और दूर तक मार करने में सक्षम होती हैं।
फिर भी टॉरपीडो पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुए हैं। खासकर पनडुब्बी युद्ध (Submarine Warfare) और एंटी-सबमरीन ऑपरेशन में इनकी भूमिका बेहद अहम है।
इतिहास में युद्ध के बाद टॉरपीडो से डूबे कुछ प्रमुख जहाजों में शामिल हैं:
INS Khukri – 1971 भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तानी पनडुब्बी द्वारा डुबोया गया
ARA General Belgrano– 1982 के Falklands War के दौरान ब्रिटिश पनडुब्बी द्वारा डुबोया गया
हालिया घटना में IRIS Dena का डूबना
इन घटनाओं से स्पष्ट है कि सही समय पर इस्तेमाल किया गया टॉरपीडो आज भी बेहद विनाशकारी साबित हो सकता है।
क्या भारत के पास टॉरपीडो हैं?
भारत की नौसेना भी आधुनिक टॉरपीडो तकनीक से लैस है। भारतीय नौसेना के पास कई स्वदेशी और विदेशी टॉरपीडो मौजूद हैं।
सबसे प्रमुख भारतीय टॉरपीडो हैं:
1. Varunastra
यह भारत का स्वदेशी हेवीवेट टॉरपीडो है जिसे Defence Research and Development Organisation ने विकसित किया है।
यह दुश्मन की पनडुब्बियों और जहाजों को निशाना बना सकता है
लंबी दूरी तक हमला करने में सक्षम
अत्याधुनिक सोनार तकनीक से लैस
2. Shyena
यह एक लाइटवेट टॉरपीडो है जिसका उपयोग मुख्य रूप से एंटी-सबमरीन युद्ध में किया जाता है।
इसे भारतीय नौसेना के जहाजों, हेलीकॉप्टरों और समुद्री गश्ती विमानों से छोड़ा जा सकता है।
विमान से भी छोड़े जाते हैं टॉरपीडो
आधुनिक युद्ध में टॉरपीडो केवल पनडुब्बियों तक सीमित नहीं हैं। कई समुद्री गश्ती विमान भी इनका इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के तौर पर **Boeing P-8 Poseidon जैसे विमान दुश्मन पनडुब्बियों का पता लगाकर उन पर टॉरपीडो गिरा सकते हैं।
भारत की नौसेना भी P-8 Poseidon विमानों का उपयोग हिंद महासागर में पनडुब्बियों की निगरानी के लिए करती है।
आज भी क्यों खतरनाक हैं टॉरपीडो?
हालांकि आज के दौर में लंबी दूरी की मिसाइलें ज्यादा इस्तेमाल होती हैं, लेकिन टॉरपीडो की कुछ खास खूबियां उन्हें अब भी बेहद खतरनाक बनाती हैं।पानी के अंदर चलने के कारण इन्हें पकड़ना मुश्किल होता है
जहाज के नीचे विस्फोट करके उसे दो हिस्सों में तोड़ सकते हैं
पनडुब्बियों के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार