पूनम शर्मा
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से भावनाओं, सांस्कृतिक प्रतीकों और पहचान की बहसों पर टिकी रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में “अंदरूनी बनाम बाहरी” का मुद्दा निर्णायक बना था। उस चुनाव में ममता बनर्जी ने खुद को “बंगाल की बेटी” के रूप में प्रस्तुत किया और यह भावनात्मक अपील व्यापक असर छोड़ गई। नतीजतन तृणमूल कांग्रेस को 213 सीटें और 47.9 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भारतीय जनता पार्टी 77 सीटों पर सिमट गई, हालांकि उसका मत प्रतिशत 38.1 तक पहुंचा।
लेकिन मौजूदा राजनीतिक संकेत बताते हैं कि इस बार समीकरण कुछ बदले हुए हैं। भाजपा ने मानो यह ठान लिया है कि वह हर उकसावे का जवाब उसी तीव्रता से नहीं देगी। वह उस राजनीतिक अखाड़े में नहीं उतरेगी, जिसकी रचना उसका प्रतिद्वंद्वी करना चाहता है।
मछली-भात की राजनीति
20 फरवरी को बंगाल भाजपा अध्यक्ष को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना पड़ा कि राज्य में मछली या मांस पर प्रतिबंध लगाने का कोई इरादा नहीं है। दिलचस्प यह है कि विवाद की शुरुआत बंगाल से नहीं हुई थी। बिहार सरकार के एक निर्देश में स्कूलों और धार्मिक स्थलों के पास मांसाहारी दुकानों को लेकर कुछ नियम बनाए गए थे।
लेकिन बंगाल में इसे तुरंत सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे से जोड़ दिया गया। “माछे-भाते बांगाली” को बंगाली अस्मिता का प्रतीक बताते हुए यह संदेश दिया गया कि भाजपा की नीतियां स्थानीय खानपान पर हमला कर सकती हैं।
यह प्रतिक्रिया केवल बयानबाजी नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा थी—भाजपा को “बाहरी” साबित करने और खुद को बंगाल की संस्कृति की रक्षक के रूप में स्थापित करने की कोशिश।
वंदे भारत के मेनू से उपजा विवाद
जनवरी में हावड़ा-कामाख्या वंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस के मेनू से मांसाहारी व्यंजन हटाए जाने की खबर ने भी विवाद को जन्म दिया। इसे भी बंगाली पहचान से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।
लेकिन इस बार भाजपा ने आक्रामक रुख नहीं अपनाया। केंद्र सरकार ने चुपचाप मेनू में संशोधन कर दिया और मामला ज्यादा तूल पकड़ने से पहले ही शांत हो गया। भाजपा समर्थकों के एक वर्ग को यह नरमी लगी, लेकिन इससे तृणमूल को वह सीधा टकराव नहीं मिला, जिसकी उसे उम्मीद थी।
“बाहरी” के सवाल से दूरी
2021 में “बाहरी बनाम अंदरूनी” का मुद्दा बेहद प्रभावी रहा था। राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता और स्थानीय नेतृत्व की अपेक्षाकृत कम दृश्यता ने इस धारणा को मजबूत किया।
अब भाजपा इस पहचान की बहस में सीधे उलझने के बजाय उससे दूरी बनाती दिख रही है। वह सांस्कृतिक प्रतीकों की राजनीति में उलझने के बजाय प्रशासन, विकास और शासन से जुड़े मुद्दों पर फोकस करना चाहती है। उसकी प्रतिक्रिया की शैली में भी बदलाव नजर आता है—पहले जहां तीखी बयानबाजी होती थी, अब वहां संयम दिखाई देता है।
आक्रामकता या बेचैनी?
तृणमूल की तीखी भाषा और लगातार हमले यह संकेत देते हैं कि वह पुराने राजनीतिक फ्रेम को दोबारा जीवित करना चाहती है। लेकिन अगर प्रतिद्वंद्वी उस फ्रेम में उतरने से ही इंकार कर दे, तो रणनीति कमजोर पड़ सकती है।
ममता बनर्जी की राजनीति लंबे समय से प्रतिरोध की छवि पर आधारित रही है—केंद्र के खिलाफ, बाहरी ताकतों के खिलाफ। लेकिन यदि भाजपा इस टकराव को व्यक्तिगत या सांस्कृतिक मुद्दा बनाने से बचती है, तो “शहादत” या “हमले के शिकार” वाली छवि गढ़ना कठिन हो जाता है।
संयम की रणनीति का जोखिम
हालांकि यह भी सच है कि अत्यधिक संयम कभी-कभी कमजोरी के रूप में देखा जा सकता है। बंगाल की राजनीति में भावनात्मक मुद्दों को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी जोखिम भरा है। भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह संतुलन बनाए रखे—न तो उकसावे में आए और न ही अपने समर्थकों को निराश होने दे।
फिलहाल जो परिदृश्य दिख रहा है, उसमें भाजपा टकराव की राजनीति से थोड़ा हटकर संयम और रणनीतिक चुप्पी पर दांव लगा रही है। यह बदलाव कितना प्रभावी साबित होगा, इसका जवाब आने वाले चुनावी माहौल में ही मिलेगा।
बंगाल की सियासत में फिलहाल एक बात स्पष्ट है—इस बार लड़ाई केवल नारों और प्रतीकों की नहीं, बल्कि रणनीति और धैर्य की भी है।