पूनम शर्मा
हाल के दिनों में देश के कई हिस्सों में ईरान से जुड़े घटनाक्रमों को लेकर विरोध-प्रदर्शनों की खबरें चर्चा में रही हैं। अयातुल्ला खामेनेई की मृत्यु की खबर के बाद कुछ राज्यों में समर्थन या विरोध के स्वर सामने आए, और यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बन गया। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक, इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
लेकिन इसी परिदृश्य में असम की स्थिति अलग नजर आई। राज्य में इस तरह का कोई बड़ा प्रदर्शन सामने नहीं आया। इसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई। कई लोगों ने इसे राज्य सरकार की सख्त कानून-व्यवस्था नीति का परिणाम बताया, तो कुछ ने इसे प्रशासनिक सतर्कता और समय रहते उठाए गए कदमों का असर माना।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा पहले भी कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर अपने सख्त रुख के लिए जाने जाते रहे हैं। अवैध गतिविधियों, कट्टरता और उग्रवाद के खिलाफ उनकी सरकार ने बीते वर्षों में कई कदम उठाए हैं। समर्थकों का मानना है कि यही कारण है कि राज्य में किसी भी प्रकार के बाहरी प्रभाव से प्रेरित प्रदर्शनों को पनपने का अवसर नहीं मिला।
यह भी उल्लेखनीय है कि देश के गृह मंत्री अमित शाह ने सभी राज्यों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी तरह के भड़काऊ या संवेदनशील प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के निर्देश दिए थे। इस पृष्ठभूमि में असम प्रशासन की सतर्कता को लेकर चर्चाएं और तेज हो गईं।
हालांकि, इस पूरे विमर्श में दो पहलू हैं। एक पक्ष यह मानता है कि राज्य की सख्त नीतियों के कारण असम में शांति बनी रही। उनका तर्क है कि यदि प्रशासन पहले से ही स्पष्ट संदेश दे दे कि किसी भी तरह की अव्यवस्था बर्दाश्त नहीं की जाएगी, तो संभावित प्रदर्शन स्वतः सीमित हो जाते हैं। वे इसे “सुरक्षित असम” की अवधारणा से जोड़ते हैं और मुख्यमंत्री की नेतृत्व क्षमता की सराहना करते हैं।
दूसरा पक्ष यह भी कहता है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति का अधिकार संवैधानिक है, बशर्ते वह कानून के दायरे में हो। इसलिए किसी राज्य में प्रदर्शन न होना केवल सख्ती का परिणाम है या फिर वहां की सामाजिक परिस्थितियां अलग हैं—इस पर भी विचार जरूरी है। असम की सामाजिक बनावट, ऐतिहासिक अनुभव और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां अन्य राज्यों से भिन्न रही हैं। इस कारण प्रशासन की प्राथमिकताएं भी अलग हो सकती हैं।
सोशल मीडिया पर “असम सुरक्षित है” जैसे संदेशों के साथ मुख्यमंत्री के समर्थन में पोस्ट साझा किए गए। कई लोगों ने लिखा कि जो लोग भारत में रहकर किसी अन्य देश के समर्थन में आक्रामक प्रदर्शन करते हैं, उन्हें कड़ा संदेश मिलना चाहिए। वहीं कुछ ने यह भी सवाल उठाया कि किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति या सामान्यीकरण से बचना चाहिए, क्योंकि हर समुदाय को एक ही नजर से देखना सामाजिक सद्भाव के लिए ठीक नहीं है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह मुद्दा केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि संदेश की राजनीति का भी है। जब राष्ट्रीय स्तर पर कोई संवेदनशील विषय उभरता है, तो राज्यों की प्रतिक्रिया उनकी राजनीतिक पहचान और नेतृत्व की छवि को भी प्रभावित करती है। असम के मामले में, समर्थक इसे मजबूत प्रशासन की मिसाल के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
यह भी सच है कि असम ने अतीत में उग्रवाद और सामाजिक तनाव के दौर देखे हैं। शायद यही कारण है कि राज्य सरकार किसी भी संभावित अस्थिरता को लेकर अतिरिक्त सतर्क रहती है। प्रशासनिक सख्ती और राजनीतिक संदेश—दोनों मिलकर एक ऐसी छवि गढ़ते हैं, जिसमें सुरक्षा और नियंत्रण को प्राथमिकता दी जाती है।
अंततः, यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि किसी एक कारण से ही राज्य में शांति बनी रही। इसमें प्रशासनिक तैयारी, राजनीतिक इच्छाशक्ति, सामाजिक संतुलन और परिस्थितियों की भूमिका—सभी शामिल हो सकते हैं।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि राष्ट्रीय बहस के इस दौर में असम की स्थिति ने ध्यान आकर्षित किया है। समर्थक इसे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की नीतियों की सफलता के रूप में देख रहे हैं, जबकि आलोचक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।
लोकतंत्र में सुरक्षा और स्वतंत्रता—दोनों के बीच संतुलन ही असली कसौटी होती है। असम का उदाहरण इसी संतुलन की चर्चा को एक नया आयाम दे रहा है।