पूनम शर्मा
मध्य पूर्व में तनाव चरम पर है। अमेरिकी-इज़राइली हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मौत के बाद सत्ता के गलियारों में तेज हलचल शुरू हो गई है। ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, वरिष्ठ धर्मगुरु Alireza Arafi को देश की नेतृत्व परिषद (Leadership Council) में जुरिस्ट सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है। यह परिषद तब तक सर्वोच्च नेता की भूमिका निभाएगी, जब तक कि विशेषज्ञों की सभा (Assembly of Experts) नया नेता नहीं चुन लेती।
अस्थायी व्यवस्था, लेकिन बड़ा राजनीतिक संकेत
ईरान का संवैधानिक ढांचा स्पष्ट करता है कि सर्वोच्च नेता के पद रिक्त होने की स्थिति में एक अंतरिम तंत्र काम करेगा। अराफी की नियुक्ति इसी प्रक्रिया का हिस्सा मानी जा रही है। हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन का संकेत भी है। अराफी को धार्मिक प्रतिष्ठान के भीतर प्रभावशाली और अपेक्षाकृत संतुलित चेहरा माना जाता है।
तेहरान में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। राजधानी और प्रमुख शहरों में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की अतिरिक्त तैनाती की गई है। सरकारी बयान में कहा गया है कि “राज्य की निरंतरता और स्थिरता सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकता है।”
हमलों के बाद क्षेत्रीय तनाव
ईरान पर हुए हमलों के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव फैल गया है। खाड़ी देशों में हवाई सेवाएं बाधित हुईं, तेल बाजारों में उतार-चढ़ाव देखा गया और कई देशों ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की। विश्लेषकों का मानना है कि होरमुज़ जलडमरूमध्य में किसी भी सैन्य गतिविधि का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ सकता है।
जनता और सियासत की प्रतिक्रिया
ईरान के कई शहरों में शोक सभाएं आयोजित की गईं। वहीं कुछ स्थानों पर सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों की भी खबरें आई हैं। सरकार ने इसे “बाहरी उकसावे” का नतीजा बताया है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि आने वाले दिनों में नेतृत्व परिषद की भूमिका बेहद अहम होगी। यह न केवल प्रशासनिक स्थिरता सुनिश्चित करेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि ईरान की विदेश और सुरक्षा नीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
फिलहाल पूरी दुनिया की निगाहें तेहरान पर टिकी हैं—क्या यह बदलाव केवल अंतरिम है या ईरान की राजनीति में किसी बड़े परिवर्तन की शुरुआत?