भारत में माओवादी आंदोलन के अंत की कहानी

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पूनम शर्मा 

भारत का सबसे लंबा चला वामपंथी उग्रवादी आंदोलन—सीपीआई (माओवादी)—अब अपने अंतिम चरण में दिखाई दे रहा है। हाल ही में पोलित ब्यूरो सदस्य थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवुजी के आत्मसमर्पण के बाद यह धारणा मजबूत हुई है कि आंदोलन का केंद्रीय नेतृत्व लगभग बिखर चुका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सचमुच अंत है, या परिस्थितियाँ फिर से इसे जन्म दे सकती हैं?

साल 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादी हिंसा को देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बताया था। इसके बाद गृह मंत्रालय में पी चिदंबरम के नेतृत्व में एक समग्र रणनीति बनाई गई। इस रणनीति का मुख्य आधार था—“क्लियर, होल्ड और डेवलप” मॉडल

राज्य पुलिस का आधुनिकीकरण

खुफिया तंत्र को मजबूत करना

दूरदराज इलाकों में सड़क, मोबाइल टावर और पुलिस कैंप स्थापित करना

पिछले एक दशक में 15,000 किमी से अधिक सड़कें बनीं, 9,000 से अधिक मोबाइल टावर लगाए गए और 656 पुलिस थानों को सुदृढ़ किया गया। करीब 200 नए सुरक्षा कैंप छत्तीसगढ़ और आंध्र–ओडिशा सीमा क्षेत्रों में स्थापित हुए।

परिणामस्वरूप 2010 की तुलना में वामपंथी उग्रवाद (LWE) से जुड़ी घटनाओं और मौतों में 80% से अधिक की गिरावट आई है। 2000 के दशक में जहां लगभग 200 जिले प्रभावित थे, वहीं 2025 के अंत तक यह संख्या घटकर 38 रह गई। अब केवल सात जिले “LWE प्रभावित” माने जाते हैं, जिनमें से तीन—बीजापुर, नारायणपुर और सुकमा—“सबसे अधिक प्रभावित” हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार ने भी इस नीति को और अधिक सख्ती के साथ जारी रखा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में 31 मार्च तक माओवाद के कोर प्रभाव को समाप्त करने की समयसीमा तय की।

माओवाद को पनपने की जमीन कैसे मिली?

माओवादी आंदोलन की जड़ें 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह में हैं। उस समय भूमि सुधार की विफलता, सामंती शोषण, जातिगत उत्पीड़न और आदिवासी समुदायों का विस्थापन जैसे मुद्दों ने इसे ताकत दी।

आदिवासी और दलित बहुल क्षेत्रों—आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और ओडिशा—में राज्य की कमजोर उपस्थिति ने माओवादियों को “वैकल्पिक सत्ता” बनने का अवसर दिया। वे स्थानीय विवाद सुलझाते, मजदूरी बढ़वाते और जमींदारों को दंडित करते थे। कई गांवों में लोगों ने पहली बार “राज्य” का चेहरा माओवादी दस्तों के रूप में देखा।

हालांकि, समय के साथ संगठन के भीतर वैचारिक कमजोरी और आपराधिक तत्वों की घुसपैठ ने इसकी साख को नुकसान पहुंचाया।

अब राज्य को क्या करना चाहिए?

माओवाद के कमजोर पड़ने के बाद सबसे बड़ी चुनौती “शून्य” को भरने की है। गृह मंत्रालय ने 31 “लीगेसी थ्रस्ट” जिलों को चिह्नित किया है, जहां विकास और सुरक्षा सहायता जारी रहेगी।

विशेषज्ञों के अनुसार:

सुरक्षा बलों की अचानक वापसी नहीं होनी चाहिए

स्थानीय युवाओं को पुलिस और प्रशासन में भर्ती किया जाए

स्कूल, अस्पताल और पंचायत व्यवस्था को मजबूत किया जाए

शिकायत निवारण तंत्र को सक्रिय बनाया जाए

सिर्फ सुरक्षा जीत पर्याप्त नहीं है; प्रशासनिक वैधता और भरोसा बनाना अधिक जरूरी है।

क्या माओवाद फिर लौट सकता है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि पारंपरिक “रेड कॉरिडोर” जैसा संगठित सशस्त्र आंदोलन लौटने की संभावना कम है। आज सड़कों, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने सूचना के प्रवाह को बढ़ा दिया है। लोगों की आकांक्षाएं बदली हैं।

फिर भी, बढ़ती असमानता और बेरोजगारी अगर बहुत तीव्र हो जाए, तो शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में मुद्दा-आधारित उग्र वामपंथी राजनीति उभर सकती है—जैसे भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण न्याय या अस्थायी रोजगार के सवाल पर।

विशेषज्ञों का मानना है कि अब राज्य की वैधता केवल सुरक्षा बलों की ताकत पर नहीं, बल्कि सुशासन, समान अवसर और सामाजिक न्याय पर निर्भर करेगी।

निष्कर्ष

भारत में माओवादी आंदोलन का सैन्य पतन लगभग तय दिखाई देता है। लेकिन इसके पीछे जो सामाजिक-आर्थिक कारण थे—भूमि असमानता, विस्थापन, प्रशासनिक उपेक्षा—वे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

यदि राज्य सुरक्षा जीत को विकास और न्याय में बदल सका, तो यह स्थायी शांति की नींव बनेगी। अन्यथा, इतिहास बताता है कि असमानता और उपेक्षा से उपजा असंतोष किसी न किसी रूप में फिर सामने आ सकता है।

 

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