पूनम शर्मा
दक्षिण एशिया एक बार फिर अस्थिरता के दौर में प्रवेश करता दिख रहा है। पाकिस्तान ने रातोंरात अफगानिस्तान के प्रमुख शहरों — काबुल और कंधार — पर हवाई हमले किए। इस्लामाबाद ने दावा किया कि यह कार्रवाई “मजबूत और प्रभावी जवाब” थी और इसमें 133 लड़ाके मारे गए।
यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब अफगानिस्तान ने विवादित ड्यूरंड लाइन पर 55 पाकिस्तानी सैनिकों को मारने का दावा किया। ड्यूरंड लाइन 2,611 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसे अफगानिस्तान आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं करता।
दोनों देशों के दावे अलग-अलग हैं। कहीं सैनिकों के मारे जाने की संख्या पर विवाद है, तो कहीं चौकियों पर कब्जे की बात कही जा रही है। नागरिकों के हताहत होने की भी खबरें हैं, खासकर सीमावर्ती शरणार्थी शिविरों के आसपास।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की। संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया। लेकिन जमीनी हालात कूटनीतिक अपील से कहीं अधिक जटिल नजर आते हैं।
भारत पर संभावित असर
यह संघर्ष भारत के लिए कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।
पहला, अफगानिस्तान में अस्थिरता का सीधा संबंध क्षेत्रीय सुरक्षा से है। भारत ने अफगानिस्तान में वर्षों तक विकास परियोजनाएँ चलाईं और वहाँ मजबूत संबंध बनाए। यदि स्थिति बिगड़ती है, तो उग्रवादी संगठनों को सक्रिय होने का अवसर मिल सकता है, जो भारत के लिए चिंता का विषय होगा।
दूसरा, यदि पाकिस्तान की सेना का ध्यान पश्चिमी सीमा पर केंद्रित होता है, तो भारत-पाक सीमा पर रणनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि यह भी संभव है कि घरेलू दबाव के चलते पाकिस्तान कड़ा रुख अपनाए।
तीसरा, भू-राजनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। चीन, रूस और ईरान जैसे देश क्षेत्र में सक्रिय हैं। भारत के लिए यह समय संतुलित और सतर्क कूटनीति का है।
निष्कर्ष
हवाई हमलों का यह दौर केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं है; यह पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। आने वाले दिन तय करेंगे कि क्या यह तनाव व्यापक युद्ध में बदलेगा या कूटनीतिक प्रयासों से नियंत्रित हो पाएगा।
भारत के लिए यह एक संवेदनशील क्षण है — जहां सतर्क रणनीति और संतुलित प्रतिक्रिया ही आगे का रास्ता तय करेगी।