राजस्थान डिस्टर्ब्ड एरिया बिल: सामाजिक संतुलन की रक्षा या सख्ती का संदेश?

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!

पूनम शर्मा
राजस्थान सरकार द्वारा पेश किया गया Rajasthan Prohibition of Transfer of Immovable Property and Provision for Protection of Tenants from Eviction from Premises in Disturbed Areas Act एक साधारण विधेयक नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को लेकर गहरी चिंता का प्रतिबिंब है। “अनुचित क्लस्टरिंग” यानी किसी एक समुदाय का अस्वाभाविक या दबाव में आकर किसी इलाके में केंद्रित हो जाना—इसे रोकने के उद्देश्य से लाया गया यह प्रस्ताव राज्य की राजनीति और समाज, दोनों में व्यापक बहस का विषय बन चुका है।

क्यों ज़रूरी समझा गया यह कदम?

राज्य सरकार का तर्क है कि कई इलाकों में हाल के वर्षों में जनसांख्यिक असंतुलन, तनाव और संपत्तियों की “डिस्टेस सेल” (औने-पौने दाम पर बिक्री) की घटनाएं सामने आई हैं। कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने पहले भी संकेत दिया था कि कुछ क्षेत्रों में लंबे समय से बसे परिवार असुरक्षा के कारण अपनी संपत्ति बेचने को मजबूर हुए।
यदि वाकई ऐसा हो रहा है, तो यह केवल संपत्ति का लेन-देन नहीं, बल्कि सामाजिक भरोसे का क्षरण है। कोई भी सरकार इस स्थिति को सामान्य नहीं मान सकती। विधेयक इसी पृष्ठभूमि में सामने आया है—ताकि संपत्ति का हस्तांतरण पूरी तरह स्वतंत्र सहमति और बाज़ार मूल्य पर हो, न कि दबाव, भय या सामूहिक उकसावे के कारण।

‘डिस्टर्ब्ड एरिया’ की अवधारणा क्या कहती है?

विधेयक के अनुसार, यदि किसी इलाके में किसी एक समुदाय का “अनुचित संकेन्द्रण” सामाजिक संतुलन को बिगाड़ने की आशंका पैदा करता है, तो सरकार उस क्षेत्र को “डिस्टर्ब्ड एरिया” घोषित कर सकती है। ऐसी स्थिति में संपत्ति के हस्तांतरण के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी।
यह प्रावधान अपने आप में असाधारण है, क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में संपत्ति का लेन-देन निजी अधिकार का हिस्सा माना जाता है। लेकिन जब वही लेन-देन सामुदायिक तनाव का कारण बनने लगे, तब राज्य का हस्तक्षेप तर्कसंगत ठहराया जा सकता है।

सख्त प्रावधान: निवारक या दमनकारी?

कानून के उल्लंघन पर 3 से 5 वर्ष तक की सजा, न्यूनतम 1 लाख रुपये या संपत्ति के 10% मूल्य तक जुर्माना, और अपराधों का गैर-जमानती होना—ये प्रावधान स्पष्ट करते हैं कि सरकार इसे हल्के में नहीं लेना चाहती।
आलोचक कह सकते हैं कि यह सख्ती अत्यधिक है, लेकिन समर्थकों का तर्क है कि यदि कानून में दंड का भय न हो, तो उसका निवारक प्रभाव भी कमजोर पड़ जाता है। खासकर जब मामला सामुदायिक संतुलन और संभावित दंगों से जुड़ा हो, तो सरकार कठोरता को प्राथमिकता देती है।

विपक्ष की आपत्तियां और राजनीतिक विमर्श

राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे असंवैधानिक और सामाजिक विभाजन को बढ़ाने वाला कदम बताया है। उनका आरोप है कि सरकार कानून-व्यवस्था की विफलता को छिपाने के लिए ऐसे कानून ला रही है।
लोकतंत्र में ऐसी आलोचना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी सच है कि सामाजिक तनाव की घटनाओं के बाद अक्सर सरकारों पर “कुछ न करने” का आरोप लगता है। ऐसे में यदि सरकार निवारक ढांचा तैयार करती है, तो उसे केवल राजनीतिक चश्मे से देखना भी उचित नहीं होगा।

अन्य राज्यों का अनुभव

“डिस्टर्ब्ड एरिया” से संबंधित कानून सबसे पहले 1980 के दशक में Punjab और Gujarat में लागू किए गए थे। बाद में पंजाब में हालात सुधरने पर यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई। यह उदाहरण बताता है कि ऐसे कानून स्थायी आपातकाल नहीं होते, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप लागू और समाप्त किए जा सकते हैं।
हाल ही में Assam ने भी भूमि हस्तांतरण को लेकर एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) को मंजूरी दी, जिसमें सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे पहलुओं की जांच शामिल है। इससे स्पष्ट है कि भूमि और जनसांख्यिकी से जुड़े प्रश्न अब कई राज्यों में नीति-निर्माण के केंद्र में हैं।

क्या यह संतुलन बनाएगा?

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह कानून वास्तव में सामाजिक सौहार्द को मजबूत करेगा? इसका उत्तर क्रियान्वयन में छिपा है। यदि “डिस्टर्ब्ड एरिया” की घोषणा पारदर्शी, तथ्य-आधारित और सीमित अवधि के लिए होगी, तो यह कदम विश्वास बहाल कर सकता है।
लेकिन यदि इसका प्रयोग राजनीतिक या चयनात्मक ढंग से हुआ, तो विवाद और गहराएंगे। इसलिए सरकार के लिए जरूरी है कि वह मॉनिटरिंग और एडवाइजरी कमेटी तथा विशेष जांच टीम को निष्पक्ष और पेशेवर बनाए।

सामाजिक ताने-बाने की रक्षा

भारत की ताकत उसकी विविधता है। किसी भी राज्य में सामाजिक संतुलन बिगड़ना केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि व्यापक असर डाल सकता है। यदि संपत्ति का लेन-देन सामाजिक दबाव का साधन बन जाए, तो यह न केवल आर्थिक असमानता बल्कि सामुदायिक अविश्वास को भी जन्म देता है।
राजस्थान का यह विधेयक इसी चिंता का समाधान खोजने की कोशिश है। यह संदेश भी देता है कि राज्य सामाजिक संतुलन को केवल नैतिक अपील के भरोसे नहीं छोड़ सकता; उसे कानूनी ढांचा भी तैयार करना होगा।

निष्कर्ष

राजस्थान डिस्टर्ब्ड एरिया बिल को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना आसान है, लेकिन इसके पीछे की सामाजिक आशंका को समझना अधिक महत्वपूर्ण है। यदि इसे संतुलित, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए, तो यह सामाजिक समरसता की रक्षा का प्रभावी उपकरण बन सकता है।
अंततः किसी भी कानून की सफलता उसके उद्देश्य में नहीं, बल्कि उसके न्यायपूर्ण और निष्पक्ष क्रियान्वयन में निहित होती है। राजस्थान के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है—जहां उसे कानून की सख्ती और सामाजिक विश्वास, दोनों के बीच संतुलन साधना होगा।

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
Leave A Reply

Your email address will not be published.