पूनम शर्मा
आज के समय में “लक्ज़री बिलीफ” शब्द सामाजिक बहस का हिस्सा बन चुका है। इस अवधारणा को अमेरिकी लेखक Rob Henderson ने लोकप्रिय बनाया। उनका तर्क है कि पहले अमीर लोग अपने स्टेटस का प्रदर्शन महंगी वस्तुओं से करते थे—कपड़े, गाड़ियाँ, घर आदि। लेकिन आज कई बार सामाजिक और वैचारिक मान्यताएँ ही नया स्टेटस सिंबल बन जाती हैं।
अर्थात, कुछ विचार इसलिए अपनाए जाते हैं क्योंकि वे प्रगतिशील, आधुनिक या नैतिक रूप से ऊँचे दिखाई देते हैं। इन विचारों को अपनाने से अभिजात वर्ग को व्यक्तिगत स्तर पर बहुत कम नुकसान होता है, लेकिन यदि वही विचार व्यापक समाज में फैलते हैं तो उनकी कीमत मध्यम और निम्न वर्ग को चुकानी पड़ सकती है।
परिवार, विवाह, सामाजिक अनुशासन और सामुदायिक सहयोग लंबे समय से भारतीय समाज की बुनियाद रहे हैं। किंतु आधुनिक विमर्श में कभी-कभी इन्हें पिछड़ा या अनावश्यक बताया जाता है। विवाह को केवल व्यक्तिगत विकल्प कहा जाता है। पारिवारिक संरचना को “बंधन” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च मूल्य घोषित किया जाता है।
यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि जब सामाजिक संरचनाएँ कमजोर होती हैं तो उसका प्रभाव किस पर सबसे अधिक पड़ता है?
सामान्यतः सम्पन्न वर्ग सुरक्षित मोहल्लों में रहता है, बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाता है और अपने निजी जीवन में स्थिर परिवार व्यवस्था बनाए रखता है। विश्वभर के शोध बताते हैं कि स्थिर दो-अभिभावक परिवार में पले बच्चे औसतन बेहतर शैक्षिक और मानसिक परिणाम दिखाते हैं। फिर भी सार्वजनिक विमर्श में विवाह या पारिवारिक प्रतिबद्धता के महत्व को कम करके दिखाया जाता है।
जब परिवार टूटते हैं, तो कानूनी विवाद, आर्थिक अस्थिरता और भावनात्मक संकट बढ़ते हैं। इन परिस्थितियों का बोझ मुख्यतः मध्यम और निम्न वर्ग उठाता है। अदालतों पर भार बढ़ता है, सामाजिक तनाव पैदा होता है और पीढ़ियों पर असर पड़ता है।
मीडिया और फिल्मों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कई कथाएँ परंपराओं के विरुद्ध विद्रोह को “कूल” बनाती हैं। जबकि वास्तविक जीवन में प्रभावशाली परिवार विवाह जैसे निर्णय सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संतुलन को ध्यान में रखकर लेते हैं। सार्वजनिक बयान और निजी व्यवहार में अंतर दिखाई देता है।
इसी प्रकार शराब या नशीले पदार्थों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय बताना आसान है, परंतु आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में इसका प्रभाव विनाशकारी हो सकता है। अभिजात वर्ग पर इसका असर सीमित रहता है, लेकिन निम्न वर्ग का पूरा घर प्रभावित हो सकता है।
यह कहना उचित नहीं कि हर आधुनिक विचार गलत है। सामाजिक सुधारों ने महिलाओं की शिक्षा, कानूनी समानता और नागरिक अधिकारों को मजबूत किया है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या कुछ विचार केवल नैतिक श्रेष्ठता दिखाने के लिए फैलाए जा रहे हैं, या वास्तव में समाज के दीर्घकालिक हित में हैं?
भारतीय समाज में परिवार केवल भावनात्मक संस्था नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा का आधार है। पश्चिमी देशों में मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र मौजूद हैं, जबकि भारत में परिवार ही प्राथमिक सहारा है। ऐसे में बिना वैकल्पिक संरचना के पारिवारिक तंत्र को कमजोर करना जोखिम भरा हो सकता है।
आज वैश्विक विचार तेजी से फैलते हैं। विश्वविद्यालयों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से नई अवधारणाएँ तुरंत लोकप्रिय हो जाती हैं। लेकिन हर समाज की अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियाँ होती हैं। एक मॉडल हर जगह लागू नहीं हो सकता।
अंततः, लक्ज़री बिलीफ पर चर्चा का उद्देश्य परिवर्तन का विरोध नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की मांग है। जब प्रभावशाली लोग किसी सामाजिक विचार को बढ़ावा देते हैं, तो उन्हें उसके संभावित परिणामों पर भी विचार करना चाहिए।
संतुलित समाज वही है जो सुधार और परंपरा के बीच सामंजस्य बनाए रखे। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक स्थिरता एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। सच्ची प्रगति वही है जो सबसे कमजोर वर्ग को सुरक्षित रखे।
विचार भी एक प्रकार की शक्ति हैं। उनका उपयोग सजावट के लिए नहीं, समाज निर्माण के लिए होना चाहिए।