शौर्य शक्ति:भारत की शौर्यशालिनी महिला योद्धा परंपरा

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समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली,24 फ़रवरी: अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केन्द्रीय कार्यालय में भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रान्त एवं माधव संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में “नामूलं लिख्यते किञ्चित” व्याख्यानमाला के अंतर्गत विशिष्ट व्याख्यान “शौर्य शक्ति:भारत की शौर्यशालिनी महिला योद्धा परंपरा’ पर आयोजित किया गया।

इस बार मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. ज्योति शुक्ला (संपादन सहायक, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नयी दिल्ली) ने अपना शोधपरक अध्ययन/उद्बोधन प्रस्तुत किया। उन्होंने शौर्यशालिनी महिला योद्धा के गौरवशाली परंपरा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कैसे भारत की शौर्यशालिनी शक्ति रूपक महिला योद्धा का प्रकटीकरण के साक्ष्य के प्रमाण हमें ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर, वैदिक, पौराणिक, साहित्यिक और पुरातात्विक रूप में आजकल यहाँ तक कि वर्ष 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर तक अनवरत रूप से परिलक्षित होता है। उन्होंने बताया कि शौर्यशालिनी शक्ति स्वरूप नारियों का सिंधु सरस्वती सभ्यता से मौर्य काल, गुप्त काल से होते हुए 19वीं सदी में झांसी रेजिमेंट तक महिला की योद्धा परंपरा का वर्चस्व प्रत्यक्षतः दिखायी पड़ता है । जो उनके शक्ति एवं शौर्य के संतुलित रूप के परिणाम स्वरूप उन्हें शौर्यशालिनी बनाता है और एक ओर जहाँ उन्होंने बताया कि कैसे यह शौर्यशालिनी, शिव अर्धनारीश्वर रूप में शक्ति है, स्त्री रूप में माता है, वह माता जो जनन एवं सृजन का कार्य करती है और योद्धा रूप में राष्ट्र पर, कुटुंब पर, धर्म पर, आस्था प; वहीं दूसरी ओर जब भी संकट आया तो अनेक आयुधों से युक्त होकर रणचंडी का रूप लेकर प्रहार करने हेतु शत्रुओं का संहार करने के लिए सदैव तत्पर होती हैं। यह व्याख्यान न केवल मातृ-शक्ति की अकादमिक दृष्टि से विवेचना में महत्वपूर्ण रही, बल्कि आगामी शोध-योजनाओं, महिला नेतृत्व के विस्तार तथा इतिहास लेखन में इसकी आवश्यकता एवं प्रभावी भागीदारी को सुनिश्चित करने की दिशा में एक सशक्त पहल के रूप में चिन्हित हुई। डॉ. ज्योति ने निष्कर्षत: बताया कि इस व्याख्यान का मुख्य उद्देश्य ऐसे मातृ-शक्ति को नए क्षितिज पर लाने का प्रयास है, जो इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हैं।

इस व्याख्यान में अखिल  भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय जी का सानिध्य एवं पाथेय प्राप्त हुआ। उन्होंने अपने महत्वपूर्ण वक्तव्य में इस पर जोर देते हुए कहा कि यह हमारी माटी की देन है कि यहाँ महिला व पुरुष में भेद नहीं किया जाता है। उन्होंने माता सीता का उदाहरण देते हुए बताया कि सीता सोने की लंका में बैठकर तृण उठाती हैं, जिसे एक क्षमतापूर्ण और शक्ति के रूप में देखा जाता है और जिसे प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसे मातृशक्ति के रूप में लगभग लाखों उदाहरण इतिहास में बिखरे पड़े हैं, जिसके समग्र अध्ययन की आवश्यकता है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. संजय मंजुल (पुरातत्वविद, अतिरिक्त महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) ने व्याख्यान की साक्ष्याधारित प्रस्तुति पर वक्ता डॉ. ज्योति शुक्ला की प्रशंसा की । उन्होंने इस तरह के विषयों पर आवश्यक शोधपरक कार्यों हेतु सभी इतिहासकारों का आह्वान किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. धर्मचंद चौबे (अध्यक्ष, भारतीय इतिहास संकलन समिति, दिल्ली प्रान्त) ने की। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. निर्मल पाण्डेय (महासचिव, भारतीय इतिहास संकलन समिति, दिल्ली प्रान्त) तथा संचालन डॉ. अजय कुमार सिंह (संगठन सचिव, दिल्ली प्रान्त) द्वारा किया गया।

कार्यक्रम में संरक्षक सदस्य प्रो. रमेश कुमार मिश्रा, प्रो. अखिलेश कुमार दुबे(उपाध्यक्ष, भारतीय इतिहास संकलन समिति, दिल्ली प्रान्त ), प्रो. यूथिका मिश्र, प्रो. प्रीति शर्मा, डॉ. जया ज्योतिका, डॉ. शुभम् केवलिया, मुकेश उपाध्याय, डॉ. सत्य प्रकाश (प्रमुख, युवा इतिहासकार), डॉ. प्रदीप उपाध्याय, डॉ. अस्मित शर्मा (कार्यालय प्रमुख, भारतीय इतिहास संकलन समिति, दिल्ली प्रान्त ), डॉ. राजकुमारी मिश्र, डॉ. राजवंती, आयुष द्विवेदी, कृष्णा द्विवेदी, संचित, सहित अनेक पदाधिकारीगण, आजीवन सदस्य एवं छह दर्जन से ज़्यादा कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
ऐसा ही कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को आयोजन को लेकर भी चर्चा हुई ।

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