बंगाल में नई सियासी हलचल: क्या हुमायूं कबीर बनेंगे ‘नए ओवैसी’?

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पूनम शर्मा
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर अप्रत्याशित मोड़ पर खड़ी है। इस बार केंद्र में हैं मुर्शिदाबाद के विवादित और निलंबित विधायक हुमायूं कबीर, जिनकी आक्रामक बयानबाजी और नई राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ राज्य की सियासत में नई हलचल पैदा कर रही हैं।

जनवरी 2026 में एक ऐसी मुलाकात हुई जिसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। Mohammad Salim, जो राज्य में Communist Party of India (Marxist) के सचिव हैं, उन्होंने कोलकाता के एक होटल में हुमायूं कबीर से मुलाकात की। यह बैठक प्रतीकात्मक रूप से बड़ी थी, क्योंकि वामपंथी राजनीति और कबीर की शैली के बीच वैचारिक दूरी किसी से छिपी नहीं है।

हुमायूं कबीर: विवाद और महत्वाकांक्षा

हुमायूं कबीर पहले All India Trinamool Congress (टीएमसी) के विधायक रहे हैं, लेकिन अब वे पार्टी से निलंबित हैं। उनकी पहचान हाल के महीनों में उस घोषणा से और मजबूत हुई, जिसमें उन्होंने अयोध्या की ध्वस्त बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक मस्जिद का मॉडल बनाने की बात कही।

2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान उनका एक बयान—जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की झलक दी—पहले ही विवादों में आ चुका है। अब वे 90 सीटों पर चुनाव लड़ने की चेतावनी दे रहे हैं। सवाल यह है कि क्या वे टीएमसी के लिए “वोट-कटर” साबित होंगे?

वाम दलों की रणनीतिक मजबूरी

2021 के विधानसभा चुनाव में Communist Party of India (Marxist) को एक भी सीट नहीं मिली थी। दशकों तक बंगाल पर शासन करने वाली पार्टी के लिए यह अस्तित्व का संकट है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व किसी भी ऐसे समीकरण की तलाश में है, जो टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक में दरार डाल सके।

बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका निर्णायक रही है। यदि हुमायूं कबीर इस वोट बैंक में सेंध लगाते हैं, तो इसका सीधा असर Mamata Banerjee की पार्टी पर पड़ सकता है। संभवतः यही कारण है कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद वाम नेतृत्व ने बातचीत का रास्ता चुना।

हालांकि, इस कदम से वाम कैडर के भीतर नाराजगी भी देखी गई। कई कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि क्या सत्ता में वापसी की कोशिश में पार्टी अपनी पुरानी राजनीतिक मर्यादाओं से समझौता कर रही है?

क्या बंगाल को मिल रहा है अपना ‘ओवैसी’?

राष्ट्रीय राजनीति में Asaduddin Owaisi की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी है, जो मुस्लिम समुदाय के मुद्दों को आक्रामक शैली में उठाते हैं और कई राज्यों में मुख्य दलों के समीकरण बदल देते हैं। बंगाल में कुछ पर्यवेक्षक हुमायूं कबीर को उसी परिप्रेक्ष्य में देखने लगे हैं।

हालांकि दोनों की राजनीतिक पृष्ठभूमि और संगठनात्मक ताकत अलग है, लेकिन शैली और लक्ष्य—अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच सीधा संवाद—में समानता दिखाई देती है। यदि कबीर स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाते हैं या किसी गठबंधन का हिस्सा बनते हैं, तो वे मुस्लिम बहुल इलाकों में समीकरण बदल सकते हैं।

टीएमसी के सामने चुनौती

टीएमसी की राजनीति लंबे समय से मुस्लिम और ग्रामीण वोट बैंक पर आधारित रही है। यदि इस आधार में दरार आती है, तो विपक्ष को अप्रत्याशित लाभ मिल सकता है। दूसरी ओर, यदि कबीर अपेक्षित समर्थन जुटाने में विफल रहते हैं, तो वे हाशिए पर भी जा सकते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में चुनाव केवल भाजपा बनाम टीएमसी की लड़ाई नहीं रह गया है। अब समीकरण बहुकोणीय होते जा रहे हैं, जहां छोटे लेकिन प्रभावशाली चेहरे परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।

आगे क्या?

हुमायूं कबीर की राजनीति अभी प्रारंभिक अवस्था में है। उनकी ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि वे अपने समर्थन को संगठित संरचना में बदल पाते हैं या नहीं। बंगाल की राजनीति में संख्या और सामाजिक समीकरण अक्सर नए नेतृत्व को जन्म देते हैं।

यदि वे सफल होते हैं, तो वे टीएमसी के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। यदि नहीं, तो यह प्रयोग भी बंगाल की राजनीतिक स्मृति में एक क्षणिक हलचल बनकर रह जाएगा।

फिलहाल इतना तय है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल शुरू हो चुकी है—और आने वाले चुनावों में इसका असर देखने को मिल सकता है

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