सुप्रीम कोर्ट : पश्चिम बंगाल में विशेष मतदाता पुनरीक्षण पर सख्त आदेश

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पूनम शर्मा 
पश्चिम बंगाल में विशेष पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: ममता सरकार के लिए बड़ा संदेश

पश्चिम बंगाल की राजनीति और प्रशासनिक ढांचे को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने अभूतपूर्व हस्तक्षेप किया है। Supreme Court of India की पीठ ने राज्य में मतदाता सूची के “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” (विशेष गहन पुनरीक्षण) को लेकर सख्त रुख अपनाया है। यह सुनवाई उस याचिका पर हुई जिसे पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से दायर किया गया था।

मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ—जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे—ने स्पष्ट संकेत दिया कि चुनावी प्रक्रिया में देरी या बाधा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के बीच भरोसे की कमी एक असाधारण परिस्थिति पैदा कर रही है, जिसके चलते विशेष निर्देश देना आवश्यक हो गया है।

1. विशेष गहन पुनरीक्षण और अदालत की सीधी निगरानी

मामले का केंद्र बिंदु मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण है, जिसे लेकर राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच टकराव की स्थिति बनती दिख रही थी। अदालत ने साफ किया कि एक स्वच्छ और अद्यतन मतदाता सूची लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियादी शर्त है और इसमें देरी नहीं हो सकती।

पीठ ने संकेत दिया कि समय खींचने की रणनीति स्वीकार्य नहीं है। अदालत की टिप्पणियों से यह स्पष्ट हुआ कि यदि प्रक्रिया पूरी नहीं की जाती तो उसके गंभीर परिणाम होंगे। अदालत ने यह भी माना कि राज्य सरकार द्वारा पर्याप्त सहयोग न मिलना चिंता का विषय है।

इसी संदर्भ में अदालत ने यह व्यवस्था की कि प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए Calcutta High Court को सक्रिय भूमिका दी जाए। यह एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि अब राज्य प्रशासन को सीधे उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करना होगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि परिणाम भी दिखाई देने चाहिए। यह संकेत था कि प्रक्रिया की प्रगति पर न्यायिक नजर बनी रहेगी।

2. न्यायिक अधिकारियों की तैनाती और प्रशासनिक जवाबदेही

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने जिला जज और अतिरिक्त जिला जज स्तर के न्यायिक अधिकारियों को इस विशेष पुनरीक्षण कार्य में लगाने का निर्देश दिया है। इसमें सेवारत और सेवानिवृत्त, दोनों तरह के अधिकारियों को शामिल करने की बात कही गई है—शर्त यह है कि उनका रिकॉर्ड बेदाग हो।

यह निर्देश इस आशंका के बीच आया कि प्रशासनिक स्तर पर सहयोग की कमी या राजनीतिक दबाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का मतलब है कि अब विवादित दावों और आपत्तियों का निपटारा एक स्वतंत्र न्यायिक निगरानी में होगा।

अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि यदि हाई कोर्ट न्यायिक अधिकारियों को इस कार्य में लगाएगा तो लंबित मामलों पर असर पड़ सकता है, फिर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुचिता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

इस कदम से स्पष्ट संदेश गया है कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर किसी भी प्रकार की ढिलाई या राजनीतिक हस्तक्षेप को न्यायपालिका स्वीकार नहीं करेगी।

3. डीजीपी से व्यक्तिगत हलफनामा और सख्त संकेत

अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह हलफनामा चुनाव आयोग द्वारा उठाई गई चिंताओं—विशेषकर धमकी, हिंसा और अधिकारियों को सहयोग न मिलने—के जवाब में मांगा गया है।

डीजीपी से व्यक्तिगत जवाब तलब करना अपने आप में गंभीर संकेत है। इसका अर्थ है कि अदालत प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करना चाहती है। यदि चुनावी अधिकारियों को धमकी या हिंसा का सामना करना पड़ रहा है, तो उसकी जवाबदेही सीधे राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारी पर तय की जा सकती है।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकीलों की बहस में यह मुद्दा भी उठा कि आदेशों के पालन में देरी हो रही है और दस्तावेज अपलोड जैसे निर्देश भी समय पर पूरे नहीं हुए। अदालत ने इस पर निराशा व्यक्त की और कहा कि सहयोग की अपेक्षा थी, जो दिखाई नहीं दे रही।

पीठ ने दो टूक कहा कि चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच विश्वास की कमी दुर्भाग्यपूर्ण है और यह स्थिति चुनावी प्रक्रिया के लिए ठीक नहीं है।

व्यापक राजनीतिक और संस्थागत संकेत

यह मामला केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है। इसमें तीन महत्वपूर्ण स्तर दिखाई देते हैं—राज्य सरकार, चुनाव आयोग और न्यायपालिका। अदालत का हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि यदि संवैधानिक संस्थाओं के बीच टकराव बढ़ता है तो न्यायपालिका निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

राज्य सरकार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बावजूद अदालत ने स्पष्ट किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया रुकेगी नहीं। यह संकेत भी दिया गया कि लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता सर्वोपरि है।

डीजीपी से व्यक्तिगत हलफनामा और हाई कोर्ट की सीधी भागीदारी, दोनों मिलकर यह दर्शाते हैं कि अदालत केवल निर्देश देकर पीछे हटने के मूड में नहीं है। यह एक संरचनात्मक निगरानी का संकेत है।

आगे की सुनवाई मार्च के बाद तय है, लेकिन फिलहाल जो आदेश आए हैं, वे पश्चिम बंगाल की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था के लिए एक स्पष्ट संदेश हैं—चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता से कोई समझौता नहीं होगा।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी रेखांकित किया है कि जब संवैधानिक संस्थाओं के बीच भरोसे की कमी सामने आती है, तो न्यायपालिका संतुलनकारी शक्ति के रूप में सामने आती है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह आदेश केवल तात्कालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रभाव भी छोड़ सकता है।

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