समग्र समाचार सेवा
मेरठ, 21 फरवरी : संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि संघ की तुलना किसी से नहीं की जा सकती, क्योंकि संघ जैसा कोई दूसरा है ही नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ की शाखा और संचलन को देखकर कुछ लोग इसे पैरा मिलिट्री संगठन समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में संघ व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है, जहां व्यक्तित्व के हर पक्ष के विकास की प्रक्रिया को मूर्त रूप दिया जाता है।
उन्होंने संघ स्थापना से पूर्व की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए बताया कि संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का संपर्क उस दौर के अनेक राष्ट्रनायकों से था। उन्होंने बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, सुभाष चन्द्र बोस, विनायक दामोदर सावरकर, भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद जैसे नेताओं के साथ विचार साझा किए। उस समय सभी का चिंतन था कि भारत बार-बार पराधीन क्यों हो रहा है। निष्कर्ष यह निकला कि समरस, संगठित और अनुशासित समाज ही सभी समस्याओं का समाधान है।
भागवत ने कहा कि भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिंदू है। मत-पंथ भिन्न हो सकते हैं, लेकिन सबका मूल भाव जोड़ने और सबके कल्याण की कामना करने का है। उन्होंने कहा कि विविधता हमारे देश का स्वभाव है, किंतु इसके बावजूद हम एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रहे हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से हमारे पूर्वजों ने एकता को सत्य और विविधता को मिथ्या बताया।
संघ के सौ वर्ष पूर्ण होने पर उन्होंने कहा कि इस दौरान संघ ने प्रतिबंध, आरोप और विरोध का सामना किया, स्वयंसेवकों ने कठिन परिस्थितियां देखीं, लेकिन दृढ़ संकल्प के बल पर संगठन आगे बढ़ता रहा। आज स्वयंसेवक समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं। शताब्दी वर्ष में संघ समाज के बीच जाकर अपने कार्यों की जानकारी दे रहा है। उन्होंने समाज की सज्जन शक्ति से राष्ट्र उत्थान के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
जिज्ञासा समाधान सत्र में शिक्षा बजट और सर्वसुलभ शिक्षा पर उन्होंने कहा कि बजट बढ़ाना सरकार का कार्य है, परंतु शिक्षा सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए। समाज को भी सहयोग की भावना से वंचित वर्गों को शिक्षित करने का प्रयास करना चाहिए। एक राष्ट्र-एक शिक्षा और स्वास्थ्य नीति पर उन्होंने कहा कि नीतियां मौजूद हैं, किंतु उनका क्रियान्वयन राज्यों का विषय है।
आदर्श मूल्यों के क्षरण पर उन्होंने मूल्य आधारित शिक्षा और संस्कारयुक्त वातावरण की आवश्यकता बताई। सामाजिक समरसता के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि व्यवहार में परिवर्तन लाना होगा। संघ में जाति का विस्मरण होता है। ओटीटी सामग्री के संबंध में उन्होंने कहा कि क्या देखना है, यह व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है।
कार्यक्रम में क्षेत्र कार्यवाह डॉ. प्रमोद कुमार, अध्यक्ष पद्मश्री भारत भूषण त्यागी, विशिष्ट अतिथि डॉ. सुमेधा आचार्य सहित विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य लोग उपस्थित रहे। संचालन प्रमोद कुमार ने और धन्यवाद ज्ञापन निपुण अग्रवाल ने किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालयों के कुलपति, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और अनेक प्रबुद्धजन शामिल हुए।