ओमान सागर में महायुद्ध की आहट?

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
पूनम शर्मा
ओमान सागर में बारूद की गंध क्या डिप्लोमेसी पर भारी पड़ेगी ‘गनबोट पॉलिसी’?

मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मुहाने पर खड़ा है जहाँ एक छोटी सी चिंगारी पूरे रीजन को सुलगा सकती है। एक तरफ जेनेवा की ठंडी वादियों में न्यूक्लियर डील को लेकर ‘इनडायरेक्ट टॉक्स’ चल रही हैं, तो दूसरी तरफ ओमान सागर की लहरों पर ईरान और रूस की नौसेनाएं अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रही हैं। अमेरिका ने दो-टूक शब्दों में कह दिया है—”डील करो या स्ट्राइक्स के लिए तैयार रहो।”

वार्ता की मेज़ और बढ़ती दूरियाँ

जेनेवा में हुई दूसरे दौर की बातचीत के बाद व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट का बयान साफ़ इशारा करता है कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ अभी भी बहुत गहरा है। हालांकि, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कुछ ‘गाइडिंग प्रिंसिपल्स’ पर सहमति की बात कही, लेकिन अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ़ कर दिया कि जब तक ईरान अपनी ‘रेड लाइन्स’ (जैसे यूरेनियम संवर्धन और मिसाइल भंडार) को पार करना बंद नहीं करता, तब तक कोई ठोस रास्ता निकलना मुश्किल है।

यहाँ मामला सिर्फ परमाणु कार्यक्रम का नहीं है, बल्कि उस ‘कॉन्स्टिट्यूशनल राइट’ का है जिसे ईरान अपना नागरिक अधिकार मानता है, जबकि अमेरिका उसे वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा करार देता है।

ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ 2.0

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अंदाज़ा हमेशा की तरह आक्रामक है। उन्होंने ‘ट्रुथ सोशल’ पर सीधा संकेत दिया कि अगर समझौता नहीं हुआ, तो चागोस आइलैंड्स स्थित एयरबेस का इस्तेमाल ईरान के संभावित हमलों को खत्म करने के लिए किया जा सकता है। फिलहाल, अमेरिकी नौसेना का यूएसएस अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर ईरानी तट से महज 700 किलोमीटर की दूरी पर तैनात है। मार्च के मध्य तक एक और कैरियर ग्रुप वहां पहुँचने वाला है। यह ‘मिलिट्री बिल्डअप’ सिर्फ दिखावा नहीं है, बल्कि एक ‘साइकलॉजिकल वारफेयर’ है।

ईरान-रूस का ‘जॉइंट फ्रंट’: एक नया पावर ब्लॉक?

जब अमेरिका ने दबाव बढ़ाया, तो ईरान ने अपने पुराने साथी रूस को गले लगा लिया। ओमान सागर में साझा युद्धाभ्यास का उद्देश्य “क्षेत्र में किसी भी एकतरफा कार्रवाई को रोकना” है। रियर एडमिरल हसन मकसूदलू के अनुसार, यह अभ्यास शांति का संदेश है, लेकिन इसके पीछे की रणनीतिक बिसात कुछ और ही कहती है।

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने चेतावनी दी है कि ईरान पर कोई भी नया हमला ‘आग से खेलने’ जैसा होगा। ऐतिहासिक रूप से देखें तो रूस का इस क्षेत्र में बढ़ता हस्तक्षेप अमेरिका की ‘सोल सुपरपावर’ वाली छवि को सीधी चुनौती है। यहाँ असल खेल ‘एनर्जी रूट्स’ और ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी’ पर कब्ज़े का है।

क्या 2024 की जंग फिर दोहराई जाएगी?

पिछले साल जब इसराइल और ईरान के बीच 12 दिनों का युद्ध छिड़ा था, तब अमेरिका ने फोर्डो, नतांज़ और इसफहान जैसे परमाणु केंद्रों पर बमबारी की थी। आज फिर वही हालात बन रहे हैं। ईरान ने धमकी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो वह हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को ब्लॉक कर देगा।

तथ्य जाँच: दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकीर्ण रास्ते से गुज़रता है। अगर यह बंद हुआ, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है और पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।

निष्कर्ष: डिप्लोमेसी या तबाही?

आने वाले कुछ हफ्ते पूरी दुनिया के लिए तनावपूर्ण होने वाले हैं। 28 फरवरी को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की इसराइल यात्रा और बेंजामिन नेतन्याहू से उनकी मुलाकात इस बात की पुष्टि करेगी कि क्या अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए ‘ग्रीन लाइट’ देने वाला है।

थिंक टैंक ‘स्टिमसन सेंटर’ की विशेषज्ञ बारबरा स्लैविन का मानना है कि वर्तमान में किसी समझौते की गुंजाइश कम ही दिखती है। शांति की उम्मीद अब सिर्फ ओमान, कतर और सऊदी अरब जैसे मध्यस्थों की ‘बैकचैनल डिप्लोमेसी’ पर टिकी है। सवाल यही है: क्या मेज़ पर बैठकर बात होगी, या समुद्र में बारूद की गंध एक नए विनाशकारी युद्ध की प्रस्तावना बनेगी?

कृपया इस पोस्ट को साझा करें!
Leave A Reply

Your email address will not be published.