पूनम शर्मा
भारतीय राजनीति के पटल पर मार्च का महीना केवल फाल्गुनी बयार लेकर नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों को झकझोरने वाला तूफान लेकर आया है। एक तरफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कानूनी और जांच एजेंसियों के चक्रव्यूह में घिरी नजर आ रही हैं, तो दूसरी तरफ पंजाब में आम आदमी पार्टी के भीतर ‘डिप्टी सीएम’ की कुर्सी को लेकर मची रार ने सरकार की स्थिरता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। इसी बीच, राज्यसभा की 37 सीटों के लिए बिगुल फूँककर चुनाव आयोग ने विपक्ष की बेचैनी और बढ़ा दी
ममता की ‘स्ट्रीट फाइटर’ छवि पर ईडी का प्रहार
कभी खुद को सड़कों पर लड़ने वाला योद्धा (स्ट्रीट फाइटर) बताने वाली ममता बनर्जी आज कोर्ट और जांच एजेंसियों के हलफनामों में उलझती दिख रही हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दाखिल किया है, वह किसी चार्जशीट से कम नहीं है। ईडी का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने जांच में न केवल बाधा डाली, बल्कि सबूतों से छेड़छाड़ और डिजिटल डेटा नष्ट करने में अपनी सत्ता का दुरुपयोग किया।
सबसे गंभीर मोड़ तब आया जब ईडी ने अदालत से इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की गुहार लगाई। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो इसमें 3 से 7 साल तक की सजा का प्रावधान है। 18 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई ममता सरकार के लिए ‘अग्निपरीक्षा’ साबित हो सकती है, क्योंकि यह समय लोकसभा चुनाव के नामांकन का होगा। उस समय प्रशासन और पुलिस चुनाव आयोग के नियंत्रण में होगी, जिससे ममता की मुश्किलें और बढ़ना तय है।
पंजाब में ‘पावर टसल’: क्या भगवंत मान की घेराबंदी हो रही है?
दिल्ली से सटे पंजाब में भी ‘ऑल इज नॉट वेल’ की स्थिति है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की हालिया अस्पताल में भर्ती होने की घटना को केवल ‘थकान’ नहीं, बल्कि बढ़ते राजनीतिक दबाव से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा गरम है कि पार्टी के भीतर दो डिप्टी सीएम बनाने की तैयारी चल रही है—एक अनुसूचित जाति (SC) से और एक अपर कास्ट से।
माना जा रहा है कि यह कदम भगवंत मान के वर्चस्व को कम करने की एक कोशिश है। मोगा रैली के दौरान जिस तरह से किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया और रूट जाम किए, उसने सरकार की कानून-व्यवस्था की पोल खोल दी। साथ ही, कांग्रेस ने मंच पर अधिकारियों की मौजूदगी को लेकर मोर्चा खोल दिया है। पंजाब कैबिनेट की बैठकों में बढ़ती तकरार यह संकेत दे रही है कि सत्ता के गलियारों में सबकुछ ठीक नहीं है।
राज्यसभा का गणित: विपक्ष के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति
चुनाव आयोग ने 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के लिए 16 मार्च की तारीख तय कर दी है। ये चुनाव केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि विपक्ष के एकजुट होने की क्षमता का लिटमस टेस्ट भी हैं। जिस तरह से कांग्रेस से इस्तीफों का दौर चल रहा है, उससे उच्च सदन में विपक्ष की ताकत और कम होने की आशंका है। राज्यसभा की इस लड़ाई में एनडीए अपना पलड़ा भारी रखने के लिए पूरी रणनीति तैयार कर चुका है, जबकि विपक्ष बिखरता हुआ नजर आ रहा है।
संवैधानिक मर्यादा और संघीय ढांचा
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत ईडी की याचिका ने एक नई बहस छेड़ दी है। क्या राज्य सरकारें केंद्रीय एजेंसियों को ‘टेरराइज’ (आतंकित) कर सकती हैं? या फिर केंद्र एजेंसियों को ‘हथियार’ (वेपनाइज) बना रहा है? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कि वह ‘अराजकता को बर्दाश्त नहीं करेगा’, इस मामले की गंभीरता को रेखांकित करती है।
आने वाले दिन भारतीय लोकतंत्र के लिए निर्णायक होंगे। क्या ममता बनर्जी इस कानूनी जाल से बाहर निकल पाएंगी? क्या पंजाब में ‘आप’ अपनी आंतरिक कलह को थाम पाएगी? इन सवालों के जवाब आने वाले हफ्तों की चुनावी गर्माहट में छिपे हैं।