राजनीति के ‘भीष्म’ का अगला पड़ाव: क्या देवेगौड़ा की पारी अभी बाकी है?

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पूनम शर्मा 
कर्नाटक की लाल मिट्टी और दिल्ली के सत्ता गलियारों में छह दशकों से अधिक का समय बिताने वाले हरदनहल्ली डोड्डेगौड़ा देवेगौड़ा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। जैसे-जैसे जून का महीना करीब आ रहा है, राज्यसभा से उनकी विदाई की आहट ने राज्य के राजनीतिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। 92 वर्ष की आयु में, जहाँ अधिकांश लोग संन्यास की गोद में होते हैं, देवेगौड़ा के लिए “अगला क्या?” का प्रश्न केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक पूरी पार्टी और एक रसूखदार समुदाय की पहचान का सवाल बन गया है।

विधानसभा का अंकगणित और राज्यसभा की डगर

वर्तमान में जनता दल (सेक्यूलर) के इकलौते उच्च सदन प्रतिनिधि के रूप में देवेगौड़ा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। कर्नाटक विधानसभा की मौजूदा स्थिति को देखें तो गणित सीधा पर चुनौतीपूर्ण है। जेडीएस के पास अपने दम पर देवेगौड़ा को दोबारा सदन भेजने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है। राज्य की चार सीटों में से तीन पर कांग्रेस का कब्जा तय माना जा रहा है, जबकि चौथी सीट के लिए भाजपा-जेडीएस गठबंधन को एकजुट होना होगा।

संवैधानिक रूप से, राज्यसभा सदस्य का चुनाव राज्य विधानसभा के सदस्यों (MLAs) द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से किया जाता है। यहाँ सवाल केवल संख्या बल का नहीं, बल्कि ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति’ का है। क्या भाजपा अपने कोटे की सीट इस ‘वयोवृद्ध राजनेता’ के लिए छोड़ेगी?

वोक्कालिगा समीकरण और भाजपा की रणनीति

भाजपा के लिए देवेगौड़ा का समर्थन करना केवल एक गठबंधन धर्म का पालन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक निवेश है। दक्षिण कर्नाटक के प्रभावकारी ‘वोक्कालिगा’ समुदाय में देवेगौड़ा की पैठ आज भी निर्विवाद है। भाजपा, जिसने ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र में संघर्ष किया है, देवेगौड़ा को सम्मान देकर इस समुदाय को एक बड़ा संदेश देना चाहती है। हालांकि, भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अक्सर भावनाओं के बजाय चुनावी लाभांश और क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता देता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या दिल्ली से हरी झंडी मिलती है।

‘किंगमेकर’ से ‘किंग’ तक का सफर

देवेगौड़ा का राजनीतिक सफर किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं रहा। 1962 में विधानसभा में प्रवेश से लेकर 1994 में मुख्यमंत्री बनने और फिर 1996 में ‘यूनाइटेड फ्रंट’ के प्रयोग के दौरान अप्रत्याशित रूप से भारत के 11वें प्रधानमंत्री के पद तक पहुँचना—उन्होंने भारतीय राजनीति के हर रंग को करीब से देखा है। उन्होंने ‘तीसरे मोर्चे’ की अवधारणा को जीवित रखा, भले ही इसके लिए उन्हें समय-समय पर विचारधारा के बजाय ‘प्रैग्मेटिज्म’ या व्यावहारिकता का सहारा लेना पड़ा। आलोचक इसे वैचारिक धुंधलापन कहते हैं, लेकिन समर्थकों के लिए यह उनका अस्तित्व बचाने का हुनर है।

क्या यह एक युग का अंत है?

2019 के लोकसभा चुनाव में तुमकुरु से मिली हार के बाद कई लोगों ने उनकी राजनीति का ‘इति’ लिख दिया था। लेकिन 2020 में कांग्रेस के समर्थन से उनकी राज्यसभा में वापसी ने साबित कर दिया कि देवेगौड़ा के रिश्ते दलीय सीमाओं से परे हैं। आज, सदन में उनकी उपस्थिति केवल एक वोट नहीं, बल्कि एक ‘जीवंत अभिलेखागार’ (Institutional Memory) की मौजूदगी है।

जेडीएस के लिए देवेगौड़ा वह बरगद हैं, जिसके बिना पार्टी अपनी पहचान खोने के डर में है। यदि उन्हें दोबारा नामांकित नहीं किया जाता, तो यह पार्टी के लिए एक अनचाहे ‘पीढ़ीगत परिवर्तन’ की शुरुआत होगी।

निष्कर्ष: दिल्ली के हाथ में फैसला

अंततः, देवेगौड़ा का राजनीतिक भविष्य बेंगलुरु की गलियों से ज्यादा नई दिल्ली के सत्ता केंद्रों में तय होगा। प्रधानमंत्री का एक निर्णय कर्नाटक में गठबंधन की मजबूती और वोक्कालिगा वोट बैंक की दिशा तय करेगा। देवेगौड़ा अक्सर कहते हैं कि वे अपनी आखिरी सांस तक राजनीति में सक्रिय रहेंगे। इतिहास गवाह है कि इस ‘मृदा पुत्र’ (Son of the Soil) के लिए राजनीतिक उपसंहार लिखना कभी भी आसान नहीं रहा है।

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